3 October 2012

सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा - नवीन


नमस्कार

जैसा कि आप सभी को ज्ञात है कि समस्या-पूर्ति आयोजन के दौरान जिस छन्द पर कार्यशाला चल रही होती है, मैं वह छन्द नहीं लिखता या फिर पोस्ट तो हरगिज़ नहीं करता। हालाँकि घनाक्षरी छंद वाले आयोजन की बहु भाषा-बोली वाली पोस्ट के लिये मेरे द्वारा गुजराती और मराठी भाषा में प्रस्तुत किये गये घनाक्षरी छन्द इस का अपवाद भी हैं। वर्तमान आयोजन के लिये जब तक आप लोग अपने दोहों के परिमार्जन में व्यस्त हैं, मैं कुछ सोरठे प्रस्तुत करने की अनुमति चाहता हूँ। आप को पूर्ण अधिकार है इन सोरठों की समीक्षा का। जहाँ भी आप को त्रुटि दिखाई पड़े, सुधार हेतु उपयुक्त सुझाव के साथ मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।


ठेस:-
हम ही थे नादान, क्या बतलाएँ आप को
सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा

उम्मीद:-
नहिं प्रसिद्धि की प्यास, न ही भूख ऐश्वर्य की
बस जब तक है श्वास, हाथ-पाँव चलते रहें

सौन्दर्य:-
नर्म, गुनगुनी धूप, खिले जिस तरह पौष में
ऐसा सौम्य-स्वरूप, केवल बिटिया में दिखे

व्यंग्य:-
चुप करिये श्रीमान, हो-हल्ला किस बात का
गिरा भले इंसान, लोहा तो उड़ने लगा

वक्रोक्ति:-
क्या बतलाएँ हाल, छूते ही झुलसे बदन
गोरी तेरे गाल, फूल नहीं, अंगार हैं

सीख:-
ढूँढ रहे हैं आप, शिस्त और तहज़ीब गर
तो छंदों की छाप, अंकित कर दें हर जगह
शिस्त = अनुशासन
तहज़ीब = संस्कार


:- नवीन सी. चतुर्वेदी

39 comments:

  1. आपकी मेल मिली.

    बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति है आपकी.
    व्यंग्य तीखे और असरकारक है.

    मेल के लिए आभार,नवीन जी.

    मेरे ब्लॉग पर आपको आये हुए भी एक अरसा हो गया है.

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  2. अति सुन्दर व श्रेष्ठ सोरठे ....बधाई नवीन जी ..

    ---इसे हम अगीत-छंद में भी लिख सकते हैं यथा..

    "आपको क्या बताएं ;
    वही ले उड़ा तिजोरी,
    जिसे दूकान थे सौंप आये
    नादान थे हम ही |"

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  3. अतिसुन्दर नवीन जी ! आप तो छन्द शास्त्र निष्णात हैं

    सादर,
    दीप्ति

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  4. अच्छी रचना
    बहुत सुंदर

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  5. क्या बतलाएँ हाल, छूते ही झुलसे बदन
    गोरी तेरे गाल, फूल नहीं, अंगार हैं
    @ इस छंद के दूसरे चरण में (आपके बताये अनुसार) नियम कुछ श्लथ हुआ है...

    क्या दोहे वाले नियम 'सोरठे' में छूट ले सकते हैं?

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  6. आपको ठेस न लगे तो ... आपके सौरठों से कुछ नकलची दोहों की मुलाक़ात करवाने की इच्छा है.

    हम ही थे नादान, क्या बतलाएँ आप को.
    सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा.

    @ कर खाली गल्ला गया, नौकर नमक हराम.
    तोंद फुलाय पड़े रहे, तो भी तुम हे राम!

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  7. उम्मीद:-
    नहिं प्रसिद्धि की प्यास, न ही भूख ऐश्वर्य की
    बस जब तक है श्वास, हाथ-पाँव चलते रहें
    @ कंगाली में सेठ जी, खुद करते हैं काम.
    दमड़ी-दमड़ी जोड़ के, होंगे फिर सुखराम.

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  8. सौन्दर्य:-
    नर्म, गुनगुनी धूप, खिले जिस तरह पौष में
    ऐसा सौम्य-स्वरूप, केवल बिटिया में दिखे
    @ सेठों की पहचान है, सुन्दर चिकनी टांट.
    मीठी बोली में छिपी, उनकी भद्दी डांट.

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  9. व्यंग्य:-
    चुप करिये श्रीमान, हो-हल्ला किस बात का
    गिरा भले इंसान, लोहा तो उड़ने लगा
    @ व्यंग्य कमाल का है. मैंने भी कोशिश की :
    लोहा कर 'हा-हा' रहा, कोयला छिपता कूक. [दूसरे चरण में एक मात्रा अधिक है... क्या करूँ?]
    चोरी-चोरी थूककर, चाट रहे फिर थूक.

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  10. एक से बढ़ कर एक

    सादर

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  11. लोहा कर 'हा-हा' रहा, कोयला छिपता कूक.
    चोरी-चोरी थूककर, चाट रहे फिर थूक.

    दोहे का निहितार्थ :
    विमान यात्राओं से देश की तिजोरी खाली करने वाले ... कोयले की कूक से छिपने वालों की दुर्दशा पर अट्टहास लगा रहे हैं.

    मतलब ये कि ... भ्रष्टाचार करो तो ऐसा करो कि दिख न पाए, समझ न आए.

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  12. सुधार :
    लोहा कर 'हा-हा' रहा, कोयला छिपता कूक. चोरी-चोरी थूक के (SIS), चाट रहे फिर थूक.

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  13. आ. प्रतुल जी दोहे के दूसरे चरण के बारे में जो शंका है उसे थोड़ा विस्तार देने की कृपा करें।

    शेष आप ने मंच से लोगों को गुदगुदाने की भरपूर कोशिश की है :)

    आभार बन्धुवर !

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  14. मयंक अवस्थी जी का मेल पर प्राप्त कमेन्ट:-

    नवीन भाई !!
    सोरठे दमदार हैं --
    हम ही थे नादान, क्या बतलाएँ आप को
    सौंपी जिसे दुकान, वही तिजोरी ले उड़ा
    इस सोरठे की जितनी प्रशंसा की जाय कम है -- राजनैतिक मंचों से ले कर
    समकालीन सन्दर्भों मे कहीं भी इसे क्वोट किया जा सकता है देर तक रहने
    वाला और दूर तक जाने वाला सोरठा कहा है।
    सौन्दर्य वाला सोरठा भी प्रभावित करता है --निराला ने अपनी बिटिया पर
    सरोज स्मृति लिखी है जो कि अमर कविता है।
    शेष सोरठे अच्छे हैं क्योंकि नवीन सी चतुर्वेदी अच्छे से कम छ्न्द नहीं कहते।
    दोहा और सोरठा में दोहा अपनी गेयता और ज़बान पर आसानी से चढ़ जाने की
    क्षमता के कारण अधिक लोकप्रिय है -- सोरठा में दोनो पंक्तियों की ध्वनि
    की अंतिम आवृत्ति सम नहीं होने के कारण यह दोहे के मुकाबले ज़बान पर उतना
    लोकप्रिय नही हो सका जितना कि इसकी अर्हता थी। दोहा भारतीय साहित्य वही
    दम रखता है जो दम गज़ल का शेर रखता है। अंतर सिर्फ संस्क्रति के संक्रमण
    के साथ साथ दोहे के स्थान पर शेर के आ जाने से है। सबसे ताकतवर और
    लोकप्रिय दोहे आज भी मध्यकाल के हैं --लेकिन जिस शक्ति के साथ आज इसका
    पुनरुत्थान हो रहा है --यदि इस प्रवृत्ति को सही उत्प्रेरक और योग्य
    साहित्यकार मिल जायें तो कोई शक नहीं कि इस छन्द में अकेले दम पर साहित्य
    जगत को जीत लेने ई शक्ति विद्द्यमान है और समकालीन साहित्यकारों ने इसका
    मुज़ाहिरा भी बहुत बार किया है। आपको बधाई कि आपने एक सार्थक दिशा का
    सार्थक प्रयास किया। शुभेच्छु --

    मयंक

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  15. आ. मयंक भाई आप का स्नेह सदैव ही इस ब्लॉग को मिलता रहा है। आशा करता हूँ आगे भी आने वाली पोस्ट्स के माध्यम से आप अपने अनुभव हमारे साथ बाँटते रहेंगे। पुनश्च आभार ....

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  16. आ. प्रतुल जी आप से तो बात हो गई, अन्य मित्रों के शंका समाधान हेतु:-

    घोषणा वाली पोस्ट का अंश:-

    "दोहे के पहले और तीसरे चरण के अंत में रगण या 212 ध्वनि संयोजन हेतु ग्यारहवीं मात्रा का लघु होना अनिवार्य। पोस्ट को बड़ी नहीं बनाना इसलिये जिन्हें इस बारे में शंका है, वे कमेन्ट या मेल या फिर मुझ से फोन [9967024593] पर बात करने की कृपा करें। "

    नियमानुसार तो रगण [गुरु लघु गुरु] ही आना चाहिए परंतु कालांतर में 212 ध्वनि संयोजन को अपना लिया गया है, 212 वज़्न के मुताबिक इस तरह के शब्द आ सकते हैं :-

    हमसफ़र
    बाँट कर
    कर भला

    ये रगण / 212 ध्वनि संयोजन दोहे के पहले + तीसरे चरण के अंत में तथा सोरठा के दूसरे
    = चौथे चरण के अंत में आना अनिवार्य है

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  17. आपकी यह बेहतरीन रचना शनिवार 06/10/2012 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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  18. आदरणीय चतुर्वेदी जी,

    मुझे समझ आ गए हैं नियमों में हुए कालान्तारी संशोधन.
    आपसे बात करने के बाद सोचता रहा कि ... आखिर ये संशोधन हुए क्यों?
    एक-एक कर कई कारण सोचे, शायद उनमें कोई सच भी हो!
    — आज भी संस्कृत भाषा में 'स्वरों' के अंतर्गत 'ऋ' सम्मिलित है. वहीं हिंदी भाषा में स्वर के रूप में उसका लोप है. वह हिन्दी व्याकरण-व्यवस्था में व्यंजन (वर्ण) रूप में तो स्वीकृत है लेकिन स्वर रूप की मात्रिक छंद में छूट ले रहा है.
    'ऋतु' को वह 'रितु' लिखने, पढ़ने और बोलने जरूर लगा है लेकिन वह स्वर उच्चारण की बजाय उसे व्यंजन उच्चारण की तरह लेता है. 'स्वर' के उच्चारण में मुख-तंत्री दो मुख अवयवों का घर्षण नहीं करती जबकि 'व्यंजन' में बिना दो अवयवों के मेल के रह नहीं पाती. इसी कारण आज हिन्दी में 'ऋ' और 'लृ' स्वरों का मनमाना प्रयोग देखने को मिल रहा है.

    — 'नियमों की टूटन' और 'नियमों में संशोधन' होने का सबसे बड़ा कारण क्या हम छंद-अभ्यासी लोगों की अल्पज्ञता या आलस्य तो नहीं या फिर पाठकों के भाव-पक्ष को महत्व देने को हम ज़्यादा तरजीह देने लगे हैं. इस कारण छंद नियमों के स्थूल नियमों को तो हम मान लेते हैं लेकिन सूक्ष्म विधानों से आँखें फेर लेते हैं. तभी कालान्तर में ऐसे संशोधन सामने आते हैं.

    — छूट पर छूट लेते जाना ... क्या काव्य 'प्रतिभा' की क्षरण-परम्परा का निर्वाह तो नहीं?


    मुझे याद आ रहा है हिंदी छंद का एक नियम :

    १] जिसमें कायदे से गुरु होने पर भी उसे लघु ही माना जाता है : कुम्हार [SSI] का उच्चारण 'कुमार' [ISI] की तरह किया जाता है इसलिए यह पाँच मात्रिक न होकर चार मात्राओं का गिना जाता है.


    उपर्युक्त नियम की तर्ज पर क्या एक और नियम बनाया जा सकता है? :

    २] जहाँ 'रहना' सहना' 'बहना' 'पहना' आदि IIS विधान वाले शब्दों को [SS] रूप में स्वीकारा जाए. क्योंकि ध्वनि-संयोजन की दृष्टि से 'ह' से पहले आने वाले व्यंजन एकारांत रूप में उच्चरित होते हैं. अर्थात 'रेह्ना', 'सेह्ना', 'बेह्ना', पेह्ना' आदि रूप में.


    समय मिलने पर लौटूँगा :

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  19. * कालान्तारी = कालान्तरी

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  20. दोहों की विस्तृत जानकारी के लिए आभार.... संग्रह में डाल लिया है.

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  21. आ. प्रतुल जी

    आप ने अच्छा विषय उठाया है। क्षरण की समस्या से हम जीवन के अधिकांश हिस्सों में जूझ रहे हैं। ईमानदारी से देखें तो 'बेस्ट-पोसिबल' नामक एक नया समास जड़ें जमा चुका है अपने समाज में। एक साथ सब कुछ एक दम ठीक कर देने की बजाय, थोड़ा-थोड़ा अनुशासन लाने का प्रयास शायद ठीक रहेगा। पर मैं आप से पूर्ण रूप से सहमत हूँ कि हमें आँखों को पूरी तरह बंद नहीं कर लेना चाहिए। देर-सबेर शब्द-भार वाले शब्द-कोष को प्रचलन में आना ही होगा।

    इस विषय पर हम फिर कभी आगे विस्तार से बात करेंगे, फिलहाल अच्छे दोहों को पढ़ने के लिये आतुर हूँ मैं।

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  22. This comment has been removed by the author.

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  23. शानदार प्रस्तुति है नवीन जी ! टिप्पणियों के माध्यम से ही खूब ज्ञानवर्धन हो रहा है ! सभी विद्वद्जनों का अभिनन्दन !

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  24. चतुर्वेदी जी कोटि कोटि अभिनन्दन ........बहुत सुन्दर अत्यंत उपयोगी मार्ग दर्शन ...हिंदी के विकास के लिए अतुलनीय योगदान ..के लिए कोटि कोटि आभार....

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  25. सभी सोरठा छंद बहुत अच्छे ... टिप्पणियाँ बहुत सारी जानकारी दे रही हैं .... आभार

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  26. बहुत रोचक विवरण एवं बहस व तथ्यांकन ...--

    तथ्य यह निकलता है कि ...भाव-सम्प्रेषण अधिक आवश्यक है .बजाय .तकनीक के....
    --- मूलतः दोहे में ..१३/११ .और सोरठे में ११/१३ ..के साथ लय व प्रवाह रखा जाय तो स्वतः आते रहते हैं..उंच-नीच करने की आवश्यकता के अधिक कष्ट में पडने की आवश्यकता नहीं होती...यही सुधार व संशोधन छंद को व काव्य को गतिशीलता व नवीनता देता है ...

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  27. .

    अय्योऽऽ मेरे राम !
    :)
    इतना श्रम ! ऐसी लगन !
    शत शत नमन प्रणाम ! प्रियवर बंधु नवीन जी !!

    एक सच्चा छंद-साधक , एक समर्पित काव्य-हितैषी और कितना काम करे … … … ?

    दोहा विधा को ढंग से समझाने के लिए पहले कितने कितने उदाहरण सामने रख दिए -
    तुलसी सूर कबीर रहीम रसखान बिहारी वृंद खुसरो नागार्जुन नीरज निदा फ़ाज़ली अरे बाबा रेऽऽऽ… … …
    एक साथ इतने नाम याद आना भी बहुत बड़ी बात है …
    धन्य हैं आप अतिप्रिय बंधुवर नवीन चतुर्वेदी जी !

    छंद की प्रतिष्ठा में आपके द्वारा किया जाने वाला कार्य स्तुत्य है … वंदनीय है … अनुकरणीय है …

    आपकी प्रत्येक पोस्ट पढ़ता हूं , घूम-घूम कर फिर पढ़ने आता रहता हूं । छंद को इस तरह हृदय से लगा कर कार्य करने वाले रचनाकार मेरे लिए बहुत श्रद्धा के पात्र होते हैं … इसे अतिशयोक्ति मत मानें …
    मन तक पहुंचे बात , निकली है मन-प्राण से !
    वरदा की सौगात , नित्य बांटिए हे गुणी !!


    सुंदर सोरठों और श्रेष्ठ आयोजन के लिए आभार ! बधाई !!
    शुभकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  28. .

    किसका करूं बखान ? सभी सोरठे श्रेष्ठ हैं !
    किया रुचिर रसपान , तृप्त हो गई आत्मा !!


    सातों सोरठे एक से बढ़कर एक हैं …
    इन दो ने लेकिन अपने ज़ादू में बांध लिया -

    *
    नर्म, गुनगुनी धूप, खिले जिस तरह पौष में
    ऐसा सौम्य-स्वरूप, केवल बिटिया में दिखे
    *
    क्या बतलाएँ हाल, छूते ही झुलसे बदन
    गोरी तेरे गाल, फूल नहीं, अंगार हैं

    वाह वाऽऽह वाऽऽऽह !


    बधाई और मंगलकामनाओं सहित…
    राजेन्द्र स्वर्णकार

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  29. बहुत अच्छे सौर्ठों
    व उनपर टिप्पणियों से ज्ञानवर्धन के लिए बधाई नवीन जी |
    आशा

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  30. Sanjiv verma 'Salil'Mon Oct 22, 05:35:00 pm 2012

    'कुमार' और 'कुम्हार' के सन्दर्भ में यह की मात्रा-निर्धारण उच्चारण पर आधारित है। दोनों शब्दों को बोलें 'कु' तथा तथा 'र' के उच्चारण स्वतंत्र हैं। 'मा' की तरह 'म्हा' का उच्चारण हो रहा है। कु+म्हा+र = 1+2+1 = 4, कुम+हा+र नहीं बोला जाता।।

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  31. sanjiv verma 'salil'Mon Oct 22, 05:44:00 pm 2012

    'रहना' सहना' 'बहना' 'पहना' आदि IIS विधान वाले शब्दों को [SS] रूप में स्वीकारा जाए. क्योंकि ध्वनि-संयोजन की दृष्टि से 'ह' से पहले आने वाले व्यंजन एकारांत रूप में उच्चरित होते हैं. अर्थात 'रेह्ना', 'सेह्ना', 'बेह्ना', पेह्ना' आदि रूप में.

    जी नहीं। यह गलत होगा। र+ह+ना = 1=1+2 = 4. तीनों वर्णों के स्वतंत्र उच्चारण हैं। र और ह को मिलाने पर 'र्ह' या 'ह्र' तथा न और ह को मिलाने पर 'न्ह' या 'ह्न' होगा यहाँ इनमें से कोई उच्चारण नहीं किया जा रहा। 'न्ह' या 'ह्न' को 'नह' की तरह नहीं पढ़ा जा सकता।

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