31 July 2014

ऐसे भक्तों की भीड़ आई है सहमे-सहमे सभी नज़ारे हैं - श्री हरि

ऐसे भक्तों की भीड़ आई है सहमे-सहमे सभी नज़ारे हैं
ठिठकी-ठिठकी सी सरयू की लहरें ख़ौफ़ खाये हुये किनारे हैं

चादरें राम-नाम की ओढ़े दोस्त खञ्ज़र लिये पधारे हैं
दोस्ती के दरख़्त मुरझाये हाथ में मुल्ला जी के आरे हैं

इन की आवाज़ में भरी तल्ख़ी उन की तक़रीर में शरारे हैं
इस तरफ़ हैं घृणा के व्यापारी उस तरफ़ नफ़रतों के मारे हैं

हर तरफ़ आँधियों का आलम है और गर्दिश में सब सितारे हैं
भूल कर भी न लोग कहते हैं तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं

:- श्री हरि

बहरे खफ़ीफ मुसद्दस मख़बून [दुगुन]
फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
2122 1212 22

No comments:

Post a Comment

नई पुरानी पोस्ट्स ढूँढें यहाँ पर

काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।