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हिन्दी गजल - अविश्वास का कोई कारण नहीं - राजमूर्ति 'सौरभ

 


अविश्वास का कोई कारण नहीं, 

कभी बोलता झूठ दर्पण नहीं।

 

जो शंकालु है ही स्वभाव आपका,

तो इस रोग का है निवारण नहीं

अवधी गजल - बदला बहुत जबाना ,अबहीं कहब त कहब्या - राजमुर्ति सौरभ

 


बदला बहुत जबाना, अबहीं कहब त कहब्या

केउ का न कुछ ठेकाना, अबहीं कहब त कहब्या

 

एतनी उमिर क बाटीं अब्बउ ठसक उहइ बा

बूढ़ा चलइँ उताना,अबहीं कहब त कहब्या

दोहे - राजमूर्ति 'सौरभ'


 

राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।

दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना नाम।।

 

एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों याम।

साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।