धरा धीर सूरज निकरबइ करे
दुखे कइ ई रतिया गुजरबइ करे
अविश्वास का कोई कारण नहीं,
कभी बोलता झूठ दर्पण नहीं।
जो शंकालु है ही स्वभाव आपका,
तो इस रोग का है निवारण नहीं
बदला बहुत जबाना, अबहीं कहब त कहब्या
केउ का न कुछ ठेकाना, अबहीं कहब त कहब्या
एतनी उमिर क बाटीं अब्बउ ठसक उहइ बा
बूढ़ा चलइँ उताना,अबहीं कहब त कहब्या
राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।
दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना
नाम।।
एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों
याम।
साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।