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माँ सरस्वती के चालीस नाम वाली सरस्वती वन्दना - नवीन

हे मरालासन्न वीणा-वादिनी माँ शारदे।

वागदेवी, भारती, वर-दायिनी माँ शारदे॥

 

श्वेत पद्मासन विराजित, वैष्णवी माँ- शारदे।

हे प्रजापति की सुता, शतरूपिणी माँ शारदे।।

 

चंद्रिका, सुर-वंदिता, जग-वंदिता, वागेश्वरी।

कामरूपा, चंद्रवदना, मालिनी माँ शारदे॥

 

अम्बिका, शुभदा, सुभद्रा, चित्रमाल्यविभूषिता।

शुक्लवर्णा, बुद्धिदा, सौदामिनी माँ शारदे॥

 

दिव्य-अंगा, पीत, विमला, रस-मयी, भामा, शिवा।

रक्त-मध्या, विंध्यवासा, गोमती माँ शारदे॥

 

पद्म-निलया, पद्म-नेत्री, रक्तबीजनिहंत्रिणी।

धूम्रलोचनमर्दना, अघ-नासिनी माँ- शारदे॥

 

हे महाभोगा, परा, पथभ्रष्ट जग सन्तप्त है।

वृष्टि कीजै प्रेम की, अनुराग की माँ शारदे॥

 

नवीन सी चतुर्वेदी

विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है - नवीन चतुर्वेदी


अग्नि-वर्ण धातु धार, हृदय प्रसन्न होंय,

स्वर्ण की विविधता में शारदे कौ वास है ।

 

सत्य, शान्ति, शील, धैर्य मातु शारदे की दैन,

प्रति एक शुचिता में शारदे कौ वास है ।

 

पाहन सों चक्र, चक्रवात’न सों विश्व बन्यौ,

नित्य की नवीनता में शारदे कौ वास है ॥

 

कल्पना विहीन विश्व कैसें विसतार पातो,

विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है ।।

 

नवीन सी. चतुर्वेदी

 

सरस्वती वन्दना, घनाक्षरी छन्द

राम जी की पहली पसन्द हनुमान हैं - नवीन

भगतों के लिये यदि राम जी कँवल हैं तो, 
राम जी के लिये मकरन्द हनुमान हैं। 

भगतों के लिये यदि राम जी समुद्र हैं तो, 
राम जी के लिये तटबन्ध हनुमान हैं। 

अखिल जगत जो कि राम जी की बगिया है, 
उस की सुहावनी सुगन्ध हनुमान हैं। 

भगतों की पहली पसन्द भले राम जी हों, 
राम जी की पहली पसन्द हनुमान हैं॥ 

*

संग-दिल सुरसा का हृदय बदल डाला ,  
सचमुच में हुनरमंद हनुमान हैं। 

राम जी का नाम जन-जन तक पहुँचाया,
सूरज हैं राम जी तो चंद हनुमान हैं। 

राम जी की आन हेतु जान पर खेल गये,
नयनों के तारे फरजंद हनुमान हैं। 

सिर्फ़ राम जी की नहीं सिर्फ़ जानकी की नहीं,
दौनों की ही पहली पसन्द हनुमान हैं॥ 

*

राम-राम-राम   बस   राम-राम, राम-राम,
जिस में लिखा है वो निबन्ध हनुमान हैं। 

भगतों के लिये यदि राम जी प्रबन्ध हैं तो, 
राम जी के लिये अनुबन्ध हनुमान हैं। 

सुर लय ताल संग अंग-अंग में समाये,
शब्द-शब्द राम छन्द-छन्द हनुमान हैं। 

यों तो राम जी को सारा जग है पसन्द किन्तु,
उस में भी पहली-पसन्द हनुमान हैं॥

नवीन सी• चतुर्वेदी


घनाक्षरी छन्द

दोहे - नवीन

दोहे

सर्दी में लागे सुखद, धीमी-धीमी आँच। 
मनुहारों की संहिता, हौले-हौले बाँच॥ 

काहे को संशय करे, काहे करे मलाल। 
राधे को मालूम है, सब के हैं नँदलाल॥ 

तब ही तो ब्रजभूमि ने, टाले सकल सवाल। 

मनमीतों से कब छुपा, मनमीतों का हाल॥ 

सारे ही संसार को, भेड़चाल मत बोल। 
बस नवीन उलझाव की, गाँठ पुरानी खोल॥

नित-नवीन आनन्द-मय, रस बरसे ख़ुश-रंग। 
हम सब हम-आहंग हों, तो सार्थक सत्संग॥

मति मधुबन-रंगन रँगै, ज्ञान तजै निज-रंग। 
हिय भींजै रस-वृष्टि सों, धन्य-धन्य सत्संग॥

यह नवीन घुड़दौड़ भी, जीत जायँगे क्रूर। 
गौतम भी मजबूर थे, हम भी हैं मजबूर॥

दो मनुष्य रस-सिन्धु का, कर न सकें रस-पान। 
एक जिसे अनुभव नहीं, दूजा अति-विद्वान॥

हम नवीन रस-सिन्धु का, कैसे करते पान। 
सारा अमरित पी गया, इक थोथा अभिमान॥

वही पुरानी-पीर है, नहिं नवीन अवसाद। 
कुछ लोगों ने खेत को, समझ रखा है खाद॥

हर नवीन युग ने उसे, दिये नवीनायाम। 
तसवीरों को देख लो, अलग-अलग हैं राम॥

तब से अब तक सौ गुना, फैल चुका संसार। 
सभ्य-सभाओं का मगर, बढा नहीं आकार॥


नवीन सी. चतुर्वेदी 

दोहे – नवीन सी. चतुर्वेदी

 घाटे का सौदा रहा, बारिश का व्यापार।
गरजे तो सौ-सौ जलद, बरसे बस दो-चार॥

इस दुनिया को छोड़ कर, उस दुनिया का नाम।
जाने किस ने रख दिया, परम-धाम, सुख-धाम॥

वही हमारी ज़िन्दगी, और वही मामूल।
ज्यों तर कपड़े तार पर चाट रहे हों धूल।।

न तो बादलों का वजन, न ही धरे कुहसार।
लेकिन पलकें ढो रहीं लाखों टन का भार॥

न तो निम्न है तम जहाँ, न ही प्रकाश महान।
ऐसे इक दरबार के हाक़िम हैं रहमान॥

अपने मन के गाँव के, सिर्फ़ यही सिरमौर।
अँगना, पौरी, देहरी,  बचपन वाले दौर।।

फिर बेशक़ तू भाड़ की, कमी गिनाना लाख।
लेकिन पहले भाड़ के भुने चने तो चाख।।

अक्षर मेरा इष्ट है, शक्ति, शब्द-सन्धान।
गुर सीखे वाल्मीकि से, ये मेरी पहिचान॥

हम ने पूछा हाट से, क्या है हमरा मोल। 
तारीफ़ों के पुल बँधे, प्रश्न हो गया गोल॥ 

तन-धारी होते सदा, तन के ही आसक्त।
पूज रहे आकार को, निराकार के भक्त॥


बाग़-बाग़ गुलजार है, राग-राग मधु-राग ।
जाग, जाग कर, जाग* कर, जाग-जाग नर जाग ॥
* यज्ञ / कर्म के सन्दर्भ में



:- नवीन सी. चतुर्वेदी

सोरठे – नवीन सी. चतुर्वेदी

 कन्या का कौमार्य - उस का ही जिम्मा नहीं।
सुनो गौर से आर्य! - ये हम पर भी फ़र्ज़ है॥

हरिक सार का सार - दो बातों में है निहित।
मधुकर की मनुहार - और कली का उन्नयन॥

सच पर नहीं विवाद - किन्तु झूठ ये भी नहीं।
हरिश्चन्द्र के बाद - सत्यवादिता कम हुई॥

डीजल वाली नाव - जब से हम खेने लेगे।
मत्स्य-मनस के घाव - दिन-दूने बढ़ने लगे॥

भरते हैं आलाप - मन-मृदंग सँग हर सुबह।
घोड़ों की पदचाप - बायसिकिल की घण्टियाँ॥

क्या बतलाऊँ यार - पहले हर दिन पर्व था।
पर अब तो त्यौहार - भी लगते हैं बोझ से॥

वो अपना अवसाद - भला भूलते किस तरह।
बारह वर्षों बाद - जिन को लाक्षागृह मिला॥

निष्कासन के तीर - ले कर सब तैयार हैं।लंका वाली पीर - कोई भी हरता नहीं॥

कैसे होती बन्द - पुरखों की छेड़ी बहस।
हम बोले मकरन्द - वो पराग पर अड़ पड़े॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

चार घनाक्षरी छन्द - नवीन

तन की दूकान देखी, धन की दूकान देखी
वस्त्र और आभूषण शामिल व्यापार में

फल–फूल, दही–दूध, मेवा, तरकारी, तेल
राग-रङ्ग हाज़िर हैं विविध आकार में

रक्त बिके, बीज बिके, मानव के अङ्ग बिकें
माटी – पानी – हवा बिके सील पैक ज़ार में

सिर्फ़ एक चीज़ यह मानव न बेच पाया
अम्मा की दुआएँ नहीं मिलतीं बाज़ार में



दादा-दादी सङ्ग खूब खेलते थे खेल और
नानी-नाना सङ्ग हम गप्पें भी लड़ाते थे

पास के ही नहीं दूर दूर के भी रिश्तेदार
हर तहवार पर बोहनी कराते थे

सच जानिये हमारी छोटी-छोटी ख़ुशियों पे
पास औ पड़ौस वाले फूले न समाते थे

हाँ मगर एक और बात है कि यही लोग
भूल करने पे हमें डाँट भी लगाते थे



डाँटने के बाद वाला प्यार मिलता हो जिसे
वही जानता है प्यार कैसे किया जाता है

सूई में धागा पिरो के फूलों को बनाते हुये
प्यार का रूमाल हौले-हौले सिया जाता है

हृदय की बावड़ी से थोड़ा-थोड़ा खींच कर
प्यार का अमृत हौले-हौले पिया जाता है

सौ बातों की एक बात यूँ समझ लें 'नवीन'
प्यार पाना हो तो विष-पान किया जाता है



विष का वमन कभी कीजिये नहीं जनाब
कीजिये तो अमृत की धार भी बहाइये

अमृत बहाना यदि सम्भव न हो सके तो
प्यार के दो मीठे-मीठे बोल ही सुनाइये

प्यार के दो मीठे बोल भी न बोल पाओ यदि
मुस्कुराते हुये दिलों में जगह पाइये

ये भी जो न हो सके तो ऐसा कीजिये ‘नवीन’
जा के किसी दरपन से लिपट जाइये 


नवीन सी. चतुर्वेदी

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै - नवीन

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै,
जल हू जरावै - जान - इन सों बचाय दै

केवड़ा, गुलाब और चन्दन की लाग दै कें
खिरकी झरोखन में खस लगवाय दै

आगरे कौ पेठौ लाय ल्होरे टुकड़ा कराय
बर्फ सङ्ग ताहि कोरे कुल्ला में धराय दै

एक उपकार और कर दै 'नवीन' प्यारे
अपनी बगल नेंक परें सरकाय दै

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

जन्म के समय से ही नाजुक व नर्म-जान - नवीन

बड़ी मस्ती से जीता है, दिलों पे राज करता है
मसर्रत बाँटने वाले के दिल में ग़म नहीं होता
बुजुर्गों की नसीहत आज़ भी सौ फ़ीसदी सच है
मुहब्बत का ख़ज़ाना बाँटने से कम नहीं होता

सभा में शोर था - तहज़ीब को आख़िर हुआ है क्या
जहाँ भी जाओ बेशर्मी हमारा मुँह चिढाती है
तभी सब लड़कियों ने एक सुर में उठ के यूँ बोला
कि जो इनसान होते हैं उन्हीं को शर्म आती है

सादगी होती है मङ्गलसूत्र में
बन्दगी होती है मंगलसूत्र में
हर सुहागिन का यही कहना है बस
ज़िन्दगी होती है मङ्गलसूत्र में


जन्म के समय से ही नाजुक व नर्म-जान
सख़्त-जान दुनिया में ख़ामुशी के साथ है
दादा, नाना, पापा, भैया, अंकलों की लाड़ली ये
अगम अनादि काल से सभी के साथ है
सुनिये ‘नवीन’ मित्र प्रीत-रीत सहचरी
ख़ुशियों की धारा, ग़म की नदी के साथ है
अपनी हथेलियों में दुनिया समेटे हुये
आसमान वाली परी धरती के साथ है

नारी नर से यूँ बोली सुनें मेरे हमजोली
तन को नहीं तनिक मन को झुकाइये
हमने हमेशा आप की ख़ुशी को मान दिया
आप भी हमारे सङ्ग-सङ्ग मुस्कुराइये
नारी का हृदय तो है लबालब भरा हुआ -
अमृत कलश जब चाहे छलकाइये
यानि कि ‘नवीन’ शुद्ध-शास्वत सनेह-रस
बूँद भर डाल कर घूँट भर पाइये

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तन की मटुकिया में मन की मथनिया से
प्रीत नवनीत हेतु बतियाँ बिलो गया
प्यारी प्यारी बातें बोल ऐसा किया डाँवाडोल
पता ही नहीं चला कि दिल कब खो गया
रङ्ग नहीं पानी नहीं हाथ भी लगाया नहीं
फिर भी ‘नवीन’ अङ्ग-अङ्ग को भिगो गया
मेरी स्नेह सरिता में मुझी को ढकेल कर
ख़ुद तो उबर गया मुझ को डुबो गया

नवीन सी. चतुर्वेदी

होली के छन्द - कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज़ - नवीन

कहाँ गईं वे मस्तियाँ, कहाँ गई वह मौज़
वे केशर की क्यारियाँ, गोबर वाले हौज़
गोबर वाले हौज़ बीच डुबकी लगवाना
कुर्ते पर ‘पागल’ वाली तख़्ती लटकाना
याद आ रहा है हम जो करते थे अक्सर
बीच सड़क पर एक रुपैया कील ठोंक कर

होता ही है हर बरस अपना तो ये हाल
जैसे ही फागुन लगे, दिल की बदले चाल
दिल की बदले चाल, हाल कुछ यूँ होता है
लगता है दुनिया मैना अरु दिल तोता है
फागुन में तो भैया ऐसो रंग चढ़े है
भङ्ग पिये बिन भी दुनिया ख़ुश-रङ्ग लगे है

होली के त्यौहार की, बड़ी अनोखी रीत
मुँह काला करते हुये जतलाते हैं प्रीत
जतलाते हैं प्रीत, रंगदारी करते हैं
सात पुश्त की ऐसी की तैसी करते हैं
करते हैं सत्कार गालियों को गा-गा कर
लेकिन सुनने वाले को भी हँसा-हँसा कर

जीजा-साली या कि फिर देवर-भाभी सङ्ग
होली के त्यौहार में, खिलते ही हैं रङ्ग
खिलते ही हैं रङ्ग, अङ्ग-प्रत्यङ्ग भिगो कर
ताई जी हँसती हैं फूफाजी को धो कर
लेकिन तब से अब में इतना अन्तर आया
पहले मन रँगते थे अब रँगते हैं काया

सब के दिल ग़मगीन हैं, बेकल सब संसार
मुमकिन हो तो इस बरस, कुछ ऐसा हो यार
कुछ ऐसा हो यार, प्यार की बगिया महकें
जिन की डाली-डाली पर दिलवाले चहकें
ऐसी अब के साल, साल भर होली खेलें
ख़ुशियों को दुलराएँ, ग़मों को पीछे ठेलें