जंबुद्वीप में आज भी , प्रेम
सुधा अनुबंध ।।
संस्कृति में संस्कार हो , शिक्षा
जग में पूर्ण ।
नई कोंपलें जब खिलें , मधुरसता का चूर्ण ।।
जंबुद्वीप में आज भी , प्रेम
सुधा अनुबंध ।।
संस्कृति में संस्कार हो , शिक्षा
जग में पूर्ण ।
नई कोंपलें जब खिलें , मधुरसता का चूर्ण ।।
बाँधै ऊखल सौं कसे, जसुदा माखन चोर।।
नरम देह कनु की भई, रसरी गरि कै लाल।
अँखियन तें अँसुवा झरैं, गरम हु’इ गवा भाल।।
(दोहा छन्द आधारित गीत)
भास्वर है भ्रू-भंगिमा, भव्य रुचिर रस-रीति
प्रकट करे पल-पल पलक, पुलकित प्रणय-प्रतीति
दो नैनों ने मान ली, दो
नैनों की बात
दो जोड़ी नैना जगें, सारी
सारी रात
कच्ची मिट्टी ले रही, अगर
ग़लत आकार
मिट्टी नहीं कुम्हार है, इसका ज़िम्मेदार
अपने ही कहने लगें, जाओ अब तो दूर ।
तब लगती है चोट जब, दिखता गहन गरूर।।
बूढ़ा तन-मन सोच में, होता
है बेचैन।
तब होती है पीर जब, सुनता तीखे बैन।।
होने देते युद्ध क्या, कभी कृष्ण भगवान।
बात, बात
से मानते, अगर दुष्ट इन्सान।।
नहीं थोपना चाहिए, अपना
कहीं महत्व।
लाख हमारा हो कहीं, प्रेम और अपनत्व।।
याति भीतिभयभीषणं वर्षं दर्पितमेव,
जनयेज्जनगणमङ्गलं ,नववर्षं हे
देव !
जनगणमनमंगल करे,हे भगवन् पच्चीस ।
राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।
दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना
नाम।।
एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों
याम।
साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।
आई है नव वर्ष की, नई नवेली भोर
।
खिड़की से दिल की मुझे, झाँक रहा
चितचोर ।।
पहुँची हो चौबीस में, लेखन से कुछ
ठेस ।
क्षमा ह्रदय से माँगता, उनसे आज रमेश ।।