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अतिथि सम्पादकीय - अर्चना वर्मा सिंह

पन्नों में कुछ शब्द उकेर देना मात्र ही साहित्य नहीं है। साहित्य एक साधना है, एक परंपरा है जो सतत चलती आ रही है। पाठकों के लिए यह एक मानसिक खुराक है, माँ शारदे का आशीष है, समाज का दर्पण है। 

ग़ज़ल - इन निगाहों पे मुहब्बत में है इल्ज़ाम बहुत - अर्चना वर्मा सिंह

 

इन निगाहों पे मुहब्बत में हैं इल्ज़ाम बहुत
बेसबब दिल को ये देती रहीं पैग़ाम बहुत
 
दिल-ए-नादाँ जो कभी करता नहीं उल्फ़त तो
ज़िन्दगी में नहीं होते कभी कोहराम बहुत