नमस्कार।
इण्टरनेट की
समस्या सिर्फ़ छोटे शहरों-कस्बों या गाँवों में ही नहीं कभी-कभी महानगर में भी अपना
परिचय देती रहती है। तीन दिन के टूर पर जाने से पूर्व
सोचा बुधवार रात को एक पोस्ट शेड्यूल करता चलूँ, परन्तु एन मौक़े पर इण्टरनेट बाबा
खूँटे से खुल गये और पोस्ट लेट हो गयी। इण्टरनेट बाबा को खूँटे से खुलता हुआ न देखा
हो तो कभी अपने इण्टरनेट स्विच / राउटर की लाइट्स को बिगड़ने के दौरान कुछ-कुछ दोलक
की तरह इधर-उधर होते देखियेगा, खूँटे से खुलने की बात समझ आ जायेगी।
साथियो आप इस मञ्च से जुड़े दो विद्वानों श्री
सौरभ पाण्डेय [09919889911] जी और श्री श्याम जी को पढ़ते रहे हैं, आज की पोस्ट में ये दौनों
रचनाधर्मी अपने कौशल्य के साथ हाज़िर हैं। पहले हम पढ़ते हैं सौरभ जी के छन्द
’मैं-तुम’ के
शुभ योग से, ’हम’ का आविर्भाव
यही व्यष्टि
विस्तार है, यही व्यष्टि अनुभाव
यही व्यष्टि
अनुभाव, ’अपर-पर’ का संचेतक
’अस्मि ब्रह्म’
उद्घोष, ’अहं’ का धुर उत्प्रेरक
’ध्यान-धारणा’
योग, सतत संतुष्ट रखे ’मैं’
’प्रेय’ क्षुद्र
व्यामोह, ’श्रेय’ निर्वाह करे ’मैं’
’तुम’ ऊर्जा, ’तुम’ प्राणवत,
’तुम’ ’मैं’ का विस्तार
गहन भाव संतृप्त
यह, मानवता का सार
मानवता का सार, सदा जग ’तुम’ से सधता
’मैं’ कारक का
सूच्य, जगत तो ’तुम’ से चलता
बहु-धारक का
भाव, जिये ज्यों खगधारी द्रुम
संज्ञाएँ प्रच्छन्न, धारता हर संभव ’तुम’
’हम’ अद्भुत
अवधारणा, ’हम’ अद्भुत संज्ञान
यह समष्टि के
मूल का अति उन्नत विज्ञान
अति उन्नत विज्ञान, व्यक्तिवाचक का व्यापन
उच्च भाव संपिण्ड, ’अहं’ का भाव समापन
उच्च मनस का
हेतु, ’भाव-कर्ता’ पर संयम
स्वार्थ तिरोहित
सान्द्र, तभी हो ’मैं-तुम’ का ’हम’
हर रचनाधर्मी अपने स्वभाव और रुचि के अनुसार रचना
रचने के लिये स्वतंत्र है और साहित्य इसी डगर पर चलते हुये हम तक पहुँचा है। अनादि
काल से कई रचनाधर्मी अन्तर्मन के गूढ रहस्यों को अपनी लेखनी के कौशल्य से सुलझाते रहे
हैं। रचनाधर्मी रचना को अपनी सन्तान की तरह समझते हैं इसलिए अपनी सन्तान को तैयार करने
में कोई कोताही नहीं बरतते। अपने तईं रचना में अपने अनुभवों को उँड़ेलते रहते हैं। साहित्य
में हर रचनाधर्म का स्वागत होता आया है। सौरभ जी के छंदों को पढ़ कर हृदय शून्य में
स्थित तत्व के और अधिक निकट पहुँच जाता है। आप को बहुत-बहुत बधाई।
पोस्ट के दूसरे
छंदानुरागी साथी हैं श्याम जी [9415156464] :-
‘मैं’ औ ‘तुम’
हैं एक ही, उसके ही दो भाव ,
जो मिलकर बन
जाँय ’हम’, हो मन सहज सुभाव |
हो मन सहज सुभाव, सत्य शिव सुन्दर हो जग,
सरल सुखद, शुचि, शांत सौम्य हो यह जीवन मग |
रहें ‘श्याम’ नहिं द्वंद्व,
द्वेष, छल-छंद जगत में,
भूल स्वार्थ
‘हम’ बनें एक होकर ‘तुम’ औ ‘में’ ||
तुम मैं प्रभु!
हैं एक ही, लोकनाथ हम आप |
बहुब्रीहि हूँ
नाथ मैं, आप तत्पुरुष भाव |
आप तत्पुरुष
भाव, लोक के नाथ सुहाए ,
लोक हमारा नाथ, नाथ मेरे मन भाये |
खोकर निज अस्तित्व, मुक्ति पाजाऊँ जग में,
मेरा ‘मैं’ हो
नष्ट, लीन होजाए तुम में ||
हम तुम मैं वह
आप सब उस ईश्वर के अंश,
फिर कैसा क्यों
द्वंद्व दें, इक दूजे को दंश |
इक दूजे को दंश, स्वार्थ अपने-अपने रत
,
परमार्थ को त्याग, स्वयं को ही छलते सब
|
अपने को पहचान
दूर होजायं सभी भ्रम,
उसी ईश के अंश, श्याम’ सब मैं वह तुम
हम ||
सौरभ जी और श्याम जी दौनों हमारे वरिष्ठ साथी
हैं और जानकार भी हैं। इस के अलावा पूर्व के अनुभवों के कारण इन दौनों साथियों के छन्द
यथावत प्रस्तुत किये गये हैं। श्याम जी ने भी “मैं, तुम और हम” की मीमांसा करने के
लिये सभी संदर्भित शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है। इस पोस्ट के छह छन्द और विशेष कर
सौरभ जी के तीन छन्द यादगार रहेंगे, हाँ..... लेकिन शब्दकोश की
सहायता के साथ। श्याम जी और सौरभ जी आप दौनों मञ्च के पुराने साथी हैं इसलिए थोड़ा सा
हास्य प्रयोग कर लिया है। आशा करता हूँ इसे पढ़ते हुये मेरी तरह आप के चहरे पर भी मुस्कुराहट
होगी। मञ्च पर अपनी यादगार निशानी अंकित करने के लिये आप दौनों का बहुत-बहुत आभार ।
तो साथियो! आनन्द लीजियेगा इन छंदों का, उत्साह वर्धन कीजियेगा
अपने साथियों का और हम बढ़ते हैं अगली पोस्ट की ओर।
विशेष: आयोजन अगर लम्बा चलता है तो बाद की पोस्ट्स को पाठक कम मिलते हैं। इसलिए सभी साथियों से निवेदन है कि अपने-अपने छन्द यथाशीघ्र भेजने की कृपा करें। और भाई कोई ज़रा रस परिवर्तन की जोख़िम भी उठाओ :)
नमस्कार