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हाकिम आज निवाले देंगे - बृजेश नीरज

गाँव-नगर में हुई मुनादी
हाकिम आज निवाले देंगे

सूख गयी आशा की खेती
घर-आँगन अँधियारा बोती
छप्पर से भी फूस झर रहा
द्वार खड़ी कुतिया है रोती

जिन आँखों की ज्योति गई है
उनको आज दियाले देंगे

सर्द हवाएँ देह खँगालें
तपन सूर्य की माँस जारती
गुदड़ी में लिपटी रातें भी
इस मन को बस आह बाँटती

आस-भरे पसरे हाथों को 
मस्जिद और शिवाले देंगे

चूल्हे हैं अब राख झाड़ते
बासन भी सब चमक रहे हैं
हरियाई सी एक लता है
फूल कहीं पर महक रहे हैं

मासूमों को पता नहीं है
वादे और हवाले देंगे 

गन्ध - बृजेश नीरज

गंध 


दुनिया में जितना पानी है 
उसमें 
आदमी के पसीने का योगदान है 

गंध भी होती है पसीने में 

हाथ की लकीरों की तरह 
हर व्यक्ति अलग होता है गंध में 
फिर भी उस गंध में 
एक अंश समान होता है 
जिसे सूँघकर 
आदमी को पहचान लेता है 
जानवर 

धीरे-धीरे कम हो रही है
यह गंध 
कम हो रहा है पसीना 
और धरती पर पानी भी
- बृजेश नीरज