हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
सियानाथ रघुकुल तिलक, कृपासिंधु प्रभु आप
करो दूर बाधा सभी, मिट जाए संताप
नाय-माय की बातें कर रै
ठलुआ सारे इतइं पबर रै
प्रणय प्रस्तावना स्वीकार कर लो
हृदय की कामना स्वीकार कर लो
समय के साथ चलना पड़ रहा है
सो अब सूरज को ढलना पड़ रहा है
बलवती होती व्यथायें क्या करें
खत्म हैं संभावनायें क्या करें
आ गईं होकर विवश कुरुक्षेत्र तक
पांडवों की याचनायें क्या करें