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नज़्म - मेरी माँ - अजय सहाब

 


ये मेरी माँ जो चला करती है लाठी लेकर

चाल में इसकी भी हिरनी सी लचक थी पहले

जिस्म से इसके अब आती है दवाओं की महक

जिस्म में इसके भी सन्दल सी महक थी पहले