अपने ही कहने लगें, जाओ अब तो दूर ।
तब लगती है चोट जब, दिखता गहन गरूर।।
बूढ़ा तन-मन सोच में, होता
है बेचैन।
तब होती है पीर जब, सुनता तीखे बैन।।
अपने ही कहने लगें, जाओ अब तो दूर ।
तब लगती है चोट जब, दिखता गहन गरूर।।
बूढ़ा तन-मन सोच में, होता
है बेचैन।
तब होती है पीर जब, सुनता तीखे बैन।।
होने देते युद्ध क्या, कभी कृष्ण भगवान।
बात, बात
से मानते, अगर दुष्ट इन्सान।।
नहीं थोपना चाहिए, अपना
कहीं महत्व।
लाख हमारा हो कहीं, प्रेम और अपनत्व।।
कविता जीवन सत्व है, कविता है रसधार ।
अलंकार,रस,छंद
में, भाव खड़े साकार ।।
भाव खड़े साकार, कल्पना
जाग्रत होती ।
कर देते धनवान, शब्द
के उत्तम मोती ।
'ठकुरेला' कविराय, हरे तम जैसे सविता ।
याति भीतिभयभीषणं वर्षं दर्पितमेव,
जनयेज्जनगणमङ्गलं ,नववर्षं हे
देव !
जनगणमनमंगल करे,हे भगवन् पच्चीस ।
राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।
दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना
नाम।।
एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों
याम।
साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।
आई है नव वर्ष की, नई नवेली भोर
।
खिड़की से दिल की मुझे, झाँक रहा
चितचोर ।।
पहुँची हो चौबीस में, लेखन से कुछ
ठेस ।
क्षमा ह्रदय से माँगता, उनसे आज रमेश ।।
अग्नि-वर्ण धातु धार, हृदय प्रसन्न
होंय,
स्वर्ण की विविधता में शारदे कौ वास है ।
सत्य, शान्ति, शील, धैर्य मातु शारदे की दैन,
प्रति एक शुचिता में शारदे कौ वास है ।
पाहन सों चक्र, चक्रवात’न सों विश्व बन्यौ,
नित्य की नवीनता में शारदे कौ वास है ॥
कल्पना विहीन विश्व कैसें विसतार पातो,
विष्णु की विराटता में शारदे कौ वास है ।।
नवीन सी. चतुर्वेदी
सरस्वती वन्दना, घनाक्षरी छन्द