Urmila Madhav लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Urmila Madhav लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

ब्रजगजल - प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ – उर्मिला माधव

 

 
प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ
यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ
 
पीर कौ अनुमान अब तक कौन कर पायौ कहौ
एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ

ब्रजगजल - कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ - उर्मिला माधव

 

कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ 

बाबरौ इनसान भरमायौ भयौ ऐ

 

हाऊँ-फाऊँ कर रह्यौ ऐ चार लँग कूँ

झूठ की दुनिया पै बौरायौ भयौ ऐ

ब्रज-गजल - बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर - उर्मिला माधव

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर
कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घट'न के रूठबे कौ डर
खड़े हैं मोर्चा पै रात दिन सैनिक हमारे तईं,
रहै हर दम करेजे में,वतन के रूठबे कौ डर
जमाने भर की चिंता में बिगारैं काम सब अपने,
ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सब'न के रूठबे कौ डर
कब'उ बेटा कौ मुंडन है,कब'उ है ब्याह लाली कौ,
कहूँ नैक'उ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर,
अजब दुनिया कौ ढर्रा ऐ,सम्हर कें, सोच कें चलियो.
तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर...
उर्मिला माधव...

बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


ब्रज गजल - उर्मिला माधव

उर्मिला माधव

कहें हम कौन तरियां ते समझ में कैसें आवैगी,
कमी-बेसी कछू भी हो,तौ जे दुनियां सिखावैगी?

न हमने काऊ पै अंगुरी उठाई है अबई तक तौ
बिना संबाई के दुनियां,कहा अंगुरी उठावैगी ?

हमारौ जी तौ दुनियां ते,हमेसा ही अलग सौ हो,
तौ फिर जे कौन सी दम पै हमें रस्ता बतावैगी ?

तुम्हें जब गैल चलनी हो तौ अपने रंग में चलियों,
अगर दुनियां की मानौगे तौ जे दुनियां नाचावैगी ,

है जब तक सांस तब तक कौ ही खेला ऐ सुनौ भैया,
कहूँ जो सांस रुक गई तौ न आवैगी न जावैगी....




न घर ई हमारौ न दुनियां हमारी,
पतौ जे चलौ कै हमईं ए भिकारी,

इमारत तौ अब लौं धरी जों की तों ऐं,
कै सांसई अचानक चली गई बिचारी,

हबाके भरे जिन्ने दुनियां में ऊंचे,
बेऊ मर कैं कित्ते भये भारी-भारी,

जि निश्चित है सब कूँ ई मरनौ पडैगौ,
कभू जाकी बारी,कभू बाकी बारी,

जो कहनी ई हमकूं,सो कहि दई ऐ हमनै,
तौ मानौ न मानौ है राजी तुम्हारी,

सबै छोड़ जानौ है दुनियां कौ मेला,
डरी यईं रहेंगी महलिया अटारी...




मैं तुमें समसान तक लै जाउंगी,
सच तुमें आँखिन ते मैं दिखवाउंगी,

ऐसी सच्चाई लिखी है राख पै,
खुद पढौगे मैं कहा पढ़वाउंगी,

श्याम मुख हों या कि हों कर्पूर मुख,
जे ई सबकौ अंत है समझाउंगी,

देह मुर्दा,आग में जर जायगी
कष्ट काया कौ कहाँ कह पाउंगी,

यईं धरे रह जांगे, घर और जमीन,
सच कहूँ तौ काहे पै इतराउंगी,





प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आंकौ जायगौ,
यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ,

पीर कौ अनुमान अब तक कौन कर पायौ कहौ,
एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ,

आँख के आँसुंन ऐ तौ तुम हाथ ते ढकि लेओगे,
घाव की दुनियां कौ हिस्सा कैसैं ढाँकौ जायगौ,

जिंदगी भर राख चूल्हे की लगी रई हाथ में
जे बताऔ और कब तक रेत फांकौ जायगौ,

झालरी,झूमर सजा केँ, देह सुन्दर कर लई,
कौन खन जे भाग मोतिन संग टांकौ जायगौ ?


उर्मिला माधव....
9873772802


ब्रज गजल 

एक कविता - उर्मिला माधव

सुनो डॉक्टर कह रहे हैं –

उर्मिला माधव




सुनो,
डॉक्टर कह रहे हैं कि अब मैं ,
अधिक नहीं जीयूँगी,
ये बताओ मेरे मरने के बाद,
तुम क्या-क्या करोगे ?
अच्छा ठीक है,
चलो कुछ बातें मैं ही बताती हूँ,
मेरी मौत जब निश्चित होजाए,
तब तुम कुछ नियमों के पालन करना,
जैसे अगर तुम नहीं रहते तो मुझे करने होते,
जैसे चूड़ियों का तोड़ना,
पर तुम चूड़ी नहीं पहनते,
तब ऐसा करना अपने हाथ की घड़ी,
परिवार के सहयोग से,पत्थर से तोड़ देना,
और उम्र भर को कसम रहे कि,
घड़ी का पहना जाना एक अपराध की तरह हो,
सिदूर तुम लगाते नहीं,
बाल मुंडवा लेना,
जब तक साँसे चलें,दोबारा कभी मत रखना केश,
किसी भी शुभ काम में,कभी झांकना भी मत ,
अगर छू दोगे तो अपशकुन न हो जाए,
इसका पूरा ध्यान रखना,
हाँ तुम्हारे पैसे,संपत्ति,
और बहुत सी कीमती चीज़ें कार,बंगला ज़मीनें,
जो भी तुम्हारा होगा सब शुभ ही रहेगा,
अशुभ सिर्फ़ तुम्हें होना है,
तुम्हारी कीमती चीज़ों को नहीं....
ध्यान रहे...


उर्मिला माधव...  9873772808

आँधियाँ चल रही हैं लहरा कर - उर्मिला माधव

उर्मिला माधव

आँधियाँ चल रही हैं लहरा कर
मैं भी रख आऊं इक दिया जा कर

हर तरफ रौशनी का आलम है,
तीरगी क्या रहेगी अब आ कर,

इन चरागों में कुछ न कुछ तो है,
लौट जाती है अब हवा आकर,

अब वहां जाने का ख्याल न कर,
दिल जहाँ टूटता है जा-जा कर,

मुझको कंदील सिर्फ़ काफ़ी है,
इसमें रुक जाये है हवा आकर

बच्ची की आबरू तक महफूज़ अब नहीं है - उर्मिला माधव

छोटी सी दास्ताँ है कह दो तो में सुनाऊँ??!
ग़र हो मुलाहिज़ा तो,आगे इसे बढाऊँ??...!

छोटी से एक बच्ची पैदा हुई ज़मीं पर,
हर सम्त तीरगी थी,न रौशनी कहीं पर,

बूढ़े पडोसी आये बोले कि क्या हुआ है??
रोते से सब लगें हैं क्या कोई मर गया है ??

घर के बुज़ुर्ग बोले न न ये सच नहीं है,
हँसने की अब हमारी औक़ात बस नहीं है

सब चीज़ ठीक ही है, कुछ भी गमीं नहीं है,
कुछ ख़ास भी नहीं है, न-ख़ास भी नहीं है,

दहलीज़ पर हमारी पैदा हुयी है बच्ची,
इतनी बड़ी मुसीबत किसको लगेगी अच्छी??

सकते में थे पडोसी, बोले कि क्या ग़ज़ब है!!
बच्ची के मामले में ये सोच भी अजब है !!

थोडा सा खाँस करके बोले बुज़ुर्ग हँस कर,
हर बात हो रही है इनसानियत से हट कर,

जीने का हक सभीको दुनिया में है बिरादर,
बच्ची हो याकि बच्चा इन्सान सब बराबर

घर के बुज़ुर्ग बोले माथे पे हाथ रख कर,
होता ही क्या है वैसे लफ़्ज़ों से बात ढक कर??

बच्ची की आबरू तक महफूज़ अब नहीं है,
परदे में रहके जीना, जीने का ढब नहीं है...