हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
हँसी हँसारत करावा जनि तू, करै लगे बतकही जमाना
घरे के बतिया गईल जो बहरे बिछाये बइठल दरी जमाना
धरा धीर सूरज निकरबइ करे
दुखे कइ ई रतिया गुजरबइ करे
बदला बहुत जबाना, अबहीं कहब त कहब्या
केउ का न कुछ ठेकाना, अबहीं कहब त कहब्या
एतनी उमिर क बाटीं अब्बउ ठसक उहइ बा
बूढ़ा चलइँ उताना,अबहीं कहब त कहब्या