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ग़ज़ल - मेरे फ़र्दा में बड़ी दूर तलक बनती है - नवीन जोशी नवा



मेरे फ़र्दा में बड़ी दूर तलक बनती है

मेरी बीनाई से कोहरे की सड़क बनती है 

 

पहले मिट्टी से बनाती है पसीना मेहनत

फिर पसीने से ही मिट्टी में महक बनती है

ग़ज़ल - जहाँ पे कानों ने सुनने का फ़न उतार दिया - नवीन जोशी 'नवा'


 

जहाँ पे कानों ने सुनने का फ़न उतार दिया

वहाँ हमारी ज़बाँ ने सुख़न उतार दिया

 

न जाने अब के ये कैसी बहार आई है

गुलों के जिस्मों से जिस ने चमन उतार दिया

कभी तो दीन के दुखड़े कभी दुनिया नहीं मिलती - नवीन जोशी 'नवा'


कभी तो दीन के दुखड़े कभी दुनिया नहीं मिलती ।

कभी गायब है खेवय्या, कभी नय्या नहीं मिलती ॥

 

न कोई पेड़ मिलता है न कोई छत ही मिलती है ।

जहां हो धूप विधिना की वहीं छाया नहीं मिलती ॥

 

बड़ा संघर्ष हो जितना बड़ी उतनी ही होगी सीख ।

महाभारत न होता तो हमें गीता नहीं मिलती ॥

 

उसे राधा भी मिलती है उसे मीरा भी मिलती है ।

मगर कान्हा को राधा में कभी मीरा नहीं मिलती ॥

 

सिया-वर को नहीं समझे सिया को कैसे समझेंगे ।

कि जिसने राम को त्यागा उसे सीता नहीं मिलती ॥

 

नवीन जोशी 'नवा'