Vijendra Sharma लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
Vijendra Sharma लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

दोहे - विजेन्द्र शर्मा

 

इक रिश्ता बेनाम सा , चला थाम के हाथ !
इक रिश्ता घुटता रहा , लेकर फेरे साथ !!
 
 
भारी पत्थर इश्क़ है , कहते थे ये "मीर" !
चलो उठा के देख लें , आगे जो तक़दीर !!

दोहे - विजेंद्र शर्मा

खुली आँख तो भोर ने, माँगा यही हिसाब !
पलकों की दहलीज़ तक, आये कितने ख्वाब !!

यारो इस तालीम की , होती नहीं किताब !
सीखो किसी फ़क़ीर से , जीने के  आदाब !!

यार ! हमारे पास है , बहुत बड़ी जागीर !
दिल में उसकी याद है, अरु नैनों में नीर !!

ज्यूँ मुरझाई फस्ल में,  जान डाल दे खाद !
हरा–भरा सा कर गयी ,मुझको तेरी याद !!

कब देखे है इश्क़ ये , किसकी है दहलीज़ !
शहज़ादे के प्यार में , पागल हुई कनीज़ !!

उर्दू - हिन्दी को  मिले  ,  ऐसे  ठेकेदार   !
जिनके घर की आबरू , अंग्रेज़ी  अखबार  !!

लिखा तुम्हारी याद में , जब हमने मज़मून !
काग़ज़ की भी आँख से , लगा टपकने ख़ून !!

डोर किसी के हाथ में ,उड़े किसी के संग !
जीवन के आकाश में ,  हम हो गये पतंग !!

कहाँ गई वो लोरियां , कहाँ गये वो चाव !
बच्चों ने भी फाड़  दी , काग़ज़ वाली नाव !!

इक सच बोला और फिर, देखा ऐसा हाल !
कुछ ने नज़रें फेर ली,कुछ की आँखें लाल !!

कहे चाँद से चाँदनी, आवे मोहे  लाज !
जब जमना की ओट से, मुझे निहारे ताज !!

मुझको यही सवाल बस , नौंचे है दिन-रात !
मैं तो उस के साथ था , वो था  किसके  साथ  !!

लहजे  जिनके फूल से , चहरे  भी  ख़ुशरंग !
उनकी बस्ती  में मिली ,दिल की  गलियाँ तंग !!

तुम ही इसमें लफ्ज़ हो , और तुम्ही मफ़हूम !
तभी हमारी नज़्म है , तुम जैसी मासूम !!

दरिया तेरा दायरा , बढ़ तो गया ज़रूर !
मगर किनारे हो गए , पहले से भी दूर !!

स्टेशन पर ही रह गये , हम लहराते हाथ !
कोई ख़ुद को छोड़कर , हमें ले गया साथ !!

जो अपने महबूब को,  समझे है सैयाद !
उसे इश्क़ की क़ैद से, कर दीजे आज़ाद !!

ग़म, आँसू, तनहाइयाँ, चारों तरफ अज़ाब !
इन कांटो के बीच भी , तेरी याद गुलाब !!

ऐसे मिलता था गले , जैसे भरत मिलाप !
वही गले का ले गया , गले लगाकर नाप !!

तुम पर लिखनी नज़्म थी , सोचा था उन्वान !
इतने में ही हो गया , काग़ज़ लहू लुहान !!