हिन्दुस्तानी-साहित्य सेवार्थ एक शैशव-प्रयास
सो जिन्स-ए-महब्बत की ख़रीदार नहीं हूँ
ख़ुद अपने ही हाथों से किया तर्के-त’अल्लुक़
अब छोड़ दिया उसको तो नादार नहीं हूँ