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खोया-खोया चाँद भी - फणीन्द्र कुमार ‘भगत’

खोया-खोया चाँद भी, गया रूठकर आज |
तारा टूटे तार का, कहाँ बजाता साज ||
कहाँ बजाता साज, घने घुप अँधियारे में,
या खुद रोता आज, चाँद के चौबारे में,
जागा सारी रात, नहीं वह तारा सोया,
गया रूठ जब प्यार, चाँद सा खोया-खोया ||


~ फणीन्द्र कुमार ‘भगत’

धर्म ध्वजा की ओट में, होता........पशु संहार - फणीन्द्र कुमार 'भगत'

नमस्कार

पिछली पोस्ट का अनुभव अच्छा नहीं रहा। ख़ैर, ये सब तो जैसे होना ही था। मञ्च को इस बार एक और नये रचनाधर्मी के दोहे मिले हैं। नाम है फणीन्द्र कुमार ‘भगत’ और आप देवास, मध्य-प्रदेश से हैं। अन्तर्जालीय साहित्य-सेवा के विगत वर्षों में मैं ने रचनाधर्मी से अधिक रचना को प्रधानता दी है। परिचय को वरीयता नहीं दी। जहाँ जो ग़लत लगा, बताने में संकोच नहीं किया और बेशक़ यह गुमान नहीं है बल्कि पाठकों को अच्छे-अच्छे छन्द पढ़वाने का दायित्व-बोध है यह। आइये सफ़र को आगे बढ़ाते हुये पढ़ते हैं फणीन्द्र जी के दोहे:-

माता के आशीष से, बिखरा.........ऐसा नूर
कृषक हुए खुशहाल सब, फसल हुई भरपूर

जगराता में मातु के, दर्शन करते लोग
कहीं चढाते पुष्प तो, कहीं लगाते भोग

माँ कुष्मांडा ने रचा, अद्भुत.....यह संसार
थोडे से ग़म भी रचे, खुशियाँ रची अपार

धर्म ध्वजा की ओट में, होता........पशु संहार
क्या सचमुच जग-तारिणी, माँ करती स्वीकार?

दया धर्म का कर्म फल, जीवन का आधार
माँ के सच्चे भक्त का, होता........बेडा पार

माँ के हर इक रूप का, करे ‘भगत’ गुणगान
छंद रचे हैं माप के, समझो इन्हें........प्रमान


धर्म-ध्वजा की ओट में........... वाह क्या दोहा हुआ है, जी हाँ दोहा हुआ है, रचनाधर्मी को बहुत-बहुत बधाई। इस उत्तम दोहे को प्रस्तुत करने का सौभाग्य मिला मुझे, मेरे लिये ख़ुशी की बात है। इसी आयोजन में खुर्शीद भाई का ‘मूरत को गलहार’, अनाम जी का ‘तुम सौम्या, तुम चण्डिका', ओम प्रकाश जी का ‘यों गरबे में दीप’ तथा  सौरभ पाण्डेय जी का ‘बाया-बाया पीर’  भी अपना जलवा बिखेर चुके हैं। आनन्द लीजिये इन दोहों का। इस के बाद बस दो पोस्ट और।