ब्रजगजल - प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ – उर्मिला माधव
यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ
एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ
ब्रजगजल - कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में – कृष्ण कुमार ‘कनक’
कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में
दीखै सिग संसार तिहारी अँखिय’न में
अन गाए कौ प्यार तिहारी अँखिय’न में
"ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार" का लोकार्पण कार्यक्रम
ईसवी सन 2025 का अन्त बड़ा ही सुखद रहा. “ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार” नामक साझा संग्रह का विमोचन अन्यान्य कारणों से टलता जा रहा था और अचानक ही फिर
ब्रजगजल - चौं तुम झूठी रार करौ हौ – भरतदीप माथुर
चौं तुम
झूठी रार करौ हौ
हमैं पतौ
है प्यार करौ हौ
खुस है रयै हो घाटो खायकैं
जे कैसो
ब्योपार करौ हौ
हम काँटन्नैं
फूल करैं हैं
तुम फूलन्नैं
हार करौ हौ
या ठगनी
माया के पीछे
चौं जूतम - पैजार
करौ हौ
जो तुमकूँ ध्यावे तुम वा की
जीवन नैया
पार करौ हौ
जनता भूकी
है राजा जी
तुम छिक कें ज्यौनार करौ हौ
वा’ जी कलम के चलवैया’औ
'दीप' बिना
उजियार करौ हौ
ब्रजगजल - लोहागढ़ की शान और आँखि’न कौ तारौ सूरजमल – सुरेन्द्र ‘सार्थक’
लोहागढ़
की शान और आँखि’न कौ तारौ सूरजमल
यों
तो राजा भौत भये पर सबते न्यारौ सूरजमल
मुगल
और अँगरेजन ते जब बडे बडे घबराय गए
दई कब्बडी, बीच खेत में खेंच्यौ फारौ, सूरजमल
ब्रजगजल - बरसाने तक अइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई - अनिमेष शर्मा 'अनिमेष'
बरसाने तक अइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई
राधा तोय रिझइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई
तेरे बिन अब नहीं सटैगी तो पै रीझ गयो
मेरौ मन
इतनी बात बतइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई
ब्रजगजल - या में बस एक अद्भुत यही बात है - ज्ञानप्रकाश गर्ग
या में बस एक अद्भुत यही बात है
प्रीत में रीत देखी नहीं जात
है
या कों ब्यौपार कह कें न
लज्जित करौ
प्रियतमे प्रीत जीवन की सौगात है
ब्रजगजल - कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ - उर्मिला माधव
कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ
बाबरौ इनसान भरमायौ भयौ ऐ
हाऊँ-फाऊँ कर रह्यौ ऐ चार
लँग कूँ
झूठ की दुनिया पै बौरायौ भयौ ऐ
माँ सरस्वती के चालीस नाम वाली सरस्वती वन्दना - नवीन
हे
मरालासन्न वीणा-वादिनी माँ शारदे।
वागदेवी, भारती, वर-दायिनी माँ शारदे॥
श्वेत
पद्मासन विराजित, वैष्णवी माँ- शारदे।
हे
प्रजापति की सुता, शतरूपिणी माँ शारदे।।
चंद्रिका, सुर-वंदिता, जग-वंदिता, वागेश्वरी।
कामरूपा, चंद्रवदना, मालिनी माँ शारदे॥
अम्बिका, शुभदा, सुभद्रा, चित्रमाल्यविभूषिता।
शुक्लवर्णा, बुद्धिदा, सौदामिनी माँ शारदे॥
दिव्य-अंगा, पीत, विमला, रस-मयी, भामा, शिवा।
रक्त-मध्या, विंध्यवासा, गोमती माँ शारदे॥
पद्म-निलया, पद्म-नेत्री, रक्तबीजनिहंत्रिणी।
धूम्रलोचनमर्दना, अघ-नासिनी
माँ- शारदे॥
हे
महाभोगा, परा, पथभ्रष्ट जग सन्तप्त है।
वृष्टि
कीजै प्रेम की, अनुराग की माँ शारदे॥
नवीन सी चतुर्वेदी
ब्रज-गजल - अबू उभरै तौ है हिय में, गिरा के रूठवे कौ डर - नवीन
ब्रज-गजल - बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर - उर्मिला माधव
कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घट'न के रूठबे कौ डर
रहै हर दम करेजे में,वतन के रूठबे कौ डर
ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सब'न के रूठबे कौ डर
कहूँ नैक'उ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर,
तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर...
उर्मिला माधव...
भैया अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय - नवीन
ब्रज गजल - ब्रज भूषण चतुर्वेदी 'दीपक'

तेरी प्रीत सयानी सी ।
बिन बदरा के सावन बरस्यौ
दुनियाँ लगै दिवानी सी ।
नैया बिन पतवार चली ।
बिना पवन के नील गगन में
धुजा लगी फहरानी सी ।
हर आँगन ज्यौं फुलवारी ।
बाग़ बगीचन ओढ़ लई है
आज चुनरिया धानी सी ।
बिन चौमासे झर लागे ।
कीच भई है आँगन आँगन
प्रीत रीत उमगानी सी ।
तेरी सी उनिहार लगै ।
पूरी दुनियां दीखै तेरी मेरी
प्रेम कहानी सी ।
ब्रज गजल - नवीन
खुद्द'इ गाल बजाय रए हौ - हत का ऐ॥
घी कों तेल बताय रए हौ - हत का ऐ॥
मोति'न पै मगराय रए हौ - हत का ऐ॥
चख-चख मैगी खाय रए हौ - हत का ऐ॥
भीतर पाग पगाय रए हौ - हत का ऐ॥
जमना में पधराय रए हौ - हत का ऐ॥
सपरेटा चढवाय रए हौ - हत का ऐ॥
कंकरीट बिछवाय रए हौ - हत का ऐ॥
बेटि'न कों बिदराय रए हौ - हत का ऐ॥
कट्टीघर खुलवाय रए हौ - हत का ऐ॥
विजया कब छनवाय रए हौ - हत का ऐ॥










