ब्रज-गजल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ब्रज-गजल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

ब्रजगजल - चार पैसा पाय कें बिन बात के बुकलात है - पूनम शर्मा पूर्णिमा

 

चार पैसा पाय कें बिन बात के बुकलात है

च्यों करै गिल्ला-गुजर, जम आइ कें लै जात है

 

जे भलौ आयौ जमानों, नैन नीचै है रहे

प्हैर कें फाटे घुटन्ना, ना कोई सकुचात है

ब्रजगजल - प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ – उर्मिला माधव

 

 
प्रेम कौ अनुपात आखिर कैसैं आँकौ जायगौ
यों बताऔ, मन के भीतर कैसैं झाँकौ जायगौ
 
पीर कौ अनुमान अब तक कौन कर पायौ कहौ
एक ही लठिया ते कैसे प्रेम हाँकौ जायगौ

ब्रजगजल - कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में – कृष्ण कुमार ‘कनक’

 

 
कहा भर्यौ करतार तिहारी अँखिय’न में
दीखै सिग संसार तिहारी अँखिय’न में
 
लट की लटकन कहै प्रेम कौ परस करौ
अन गाए कौ प्यार तिहारी अँखिय’न में

"ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार" का लोकार्पण कार्यक्रम

 

ईसवी सन 2025 का अन्त बड़ा ही सुखद रहा. “ब्रजभाषा के प्रतिनिधि गजलकार” नामक साझा संग्रह का विमोचन अन्यान्य कारणों से टलता जा रहा था और अचानक ही फिर

ब्रजगजल - चौं तुम झूठी रार करौ हौ – भरतदीप माथुर

 


चौं   तुम   झूठी रार करौ हौ

हमैं  पतौ  है   प्यार करौ हौ

 

खुस है रयै हो घाटो खायकैं

जे    कैसो  ब्योपार करौ हौ

 

हम  काँटन्नैं  फूल  करैं    हैं

तुम    फूलन्नैं  हार  करौ हौ

 

या  ठगनी   माया   के पीछे

चौं  जूतम - पैजार  करौ हौ

 

जो तुमकूँ ध्यावे तुम वा की

जीवन   नैया  पार  करौ हौ

 

जनता  भूकी  है  राजा जी

तुम छिक कें ज्यौनार करौ हौ

 

वा’ जी कलम के चलवैया’औ

'दीप' बिना उजियार करौ हौ

ब्रजगजल - लोहागढ़ की शान और आँखि’न कौ तारौ सूरजमल – सुरेन्द्र ‘सार्थक’

 


लोहागढ़ की शान और आँखि’न कौ तारौ सूरजमल

यों तो राजा भौत भये पर सबते न्यारौ सूरजमल

 

मुगल और अँगरेजन ते जब बडे बडे घबराय गए

दई कब्बडी, बीच खेत में खेंच्यौ फारौ, सूरजमल

ब्रजगजल - यत्न कर-कर कें लाख हारे लोग - डॉ. प्रमोद सागर

 


यत्न कर-कर कें लाख हारे लोग 

अब कहाँ जामें ये बिचारे लोग

ब्रजगजल - बरसाने तक अइवे में ही मेरी सगरी उमर गुजर गई - अनिमेष शर्मा 'अनिमेष'

 


बरसाने तक अइवे में ही  मेरी सगरी उमर गुजर गई

राधा तोय  रिझइवे में ही  मेरी सगरी उमर गुजर गई

 

तेरे  बिन  अब  नहीं  सटैगी  तो  पै  रीझ  गयो मेरौ  मन

इतनी बात  बतइवे में ही  मेरी सगरी  उमर गुजर गई

ब्रजगजल - या में बस एक अद्भुत यही बात है - ज्ञानप्रकाश गर्ग

 


या में बस एक अद्भुत यही बात है

प्रीत में रीत देखी नहीं जात है

 

या कों ब्यौपार कह कें न लज्जित करौ

प्रियतमे प्रीत जीवन की सौगात है

ब्रजगजल - कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ - उर्मिला माधव

 

कौनसी बातन पै इतरायौ भयौ ऐ 

बाबरौ इनसान भरमायौ भयौ ऐ

 

हाऊँ-फाऊँ कर रह्यौ ऐ चार लँग कूँ

झूठ की दुनिया पै बौरायौ भयौ ऐ

माँ सरस्वती के चालीस नाम वाली सरस्वती वन्दना - नवीन

हे मरालासन्न वीणा-वादिनी माँ शारदे।

वागदेवी, भारती, वर-दायिनी माँ शारदे॥

 

श्वेत पद्मासन विराजित, वैष्णवी माँ- शारदे।

हे प्रजापति की सुता, शतरूपिणी माँ शारदे।।

 

चंद्रिका, सुर-वंदिता, जग-वंदिता, वागेश्वरी।

कामरूपा, चंद्रवदना, मालिनी माँ शारदे॥

 

अम्बिका, शुभदा, सुभद्रा, चित्रमाल्यविभूषिता।

शुक्लवर्णा, बुद्धिदा, सौदामिनी माँ शारदे॥

 

दिव्य-अंगा, पीत, विमला, रस-मयी, भामा, शिवा।

रक्त-मध्या, विंध्यवासा, गोमती माँ शारदे॥

 

पद्म-निलया, पद्म-नेत्री, रक्तबीजनिहंत्रिणी।

धूम्रलोचनमर्दना, अघ-नासिनी माँ- शारदे॥

 

हे महाभोगा, परा, पथभ्रष्ट जग सन्तप्त है।

वृष्टि कीजै प्रेम की, अनुराग की माँ शारदे॥

 

नवीन सी चतुर्वेदी

ब्रज-गजल - अबू उभरै तौ है हिय में, गिरा के रूठवे कौ डर - नवीन

ब्रज-गजल - रूठवे कौ डर 
================== 
अबू उभरै तौ है हिय में - गिरा1 के रूठवे कौ डर। 
मगर अब कम भयौ है - शारदा के रूठवे कौ डर॥

सलौने-साँवरे नटखट बिरज में जब सों तू आयौ। 
न जानें काँ गयौ - परमातमा के रूठवे कौ डर॥

सुदामा और कनुआ की कथा सों हम तौ यै सीखे। 
विनय के पद पढावै है - सखा के रूठवे कौ डर॥

कोऊ मानें न मानें वा की मरजी, हम तौ मानें हैं। 
हमें झुकवौ सिखावै है - सभा के रूठवे कौ डर॥

हहा अब तौ ठिठोली सों जमानौ रूठ जावें है। 
कहूँ गायब न कर डारै - ठहाके - रूठवे कौ डर॥

निरे सत्कर्म ही थोड़ें करावै माइ-बाप'न सों। 
कबू छल हू करावै है – सुता2 के रूठवे कौ डर॥

हमें तौ नाँय काऊ 'और' कों तकलीफ है तुम सों। 
डरावै है तुम्हें वा ही 'तथा' के रूठवे कौ डर॥

घनेरे लोग बीस'न बेर कुनबा कों डला कह'तें। 
डरावै है सब'न कों या डला के रूठवे कौ डर॥

'नवीन' इतिहास में हम जाहु नायक सों मिले, वा के। 
मगज में साफ देख्यौ - नायिका के रूठवे कौ डर॥

गिरह कौ शेर:- 
बड़ी मुस्किल सों रसिया रास कों राजी भयौ, लेकिन। 
"लली कौ जीउ धसकावै लला के रूठवे कौ डर"॥

1 वाणी, सरस्वती 2 बेटी


नवीन सी. चतुर्वेदी 

ब्रज-गजल - बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर - उर्मिला माधव

बिगर बरसात के रहबै, चमन के रूठबे कौ डर
कहूँ जो ब्यार चल बाजी, घट'न के रूठबे कौ डर
खड़े हैं मोर्चा पै रात दिन सैनिक हमारे तईं,
रहै हर दम करेजे में,वतन के रूठबे कौ डर
जमाने भर की चिंता में बिगारैं काम सब अपने,
ऑ जाऊ पै लगौ रहबै,सब'न के रूठबे कौ डर
कब'उ बेटा कौ मुंडन है,कब'उ है ब्याह लाली कौ,
कहूँ नैक'उ कमी रह गई,बहन के रूठबे कौ डर,
अजब दुनिया कौ ढर्रा ऐ,सम्हर कें, सोच कें चलियो.
तनिक भी चूक है गई तौ सजन के रूठबे कौ डर...
उर्मिला माधव...

बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


भैया अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय - नवीन



भैया! अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय
*************************************** 

हम खुस हैं लेकिन मैया की हालत अच्छी नाँय। 
कनुप्रिया रवि की तनुजा१ की हालत अच्छी नाँय॥ 

कौन सौ म्हों लै कें मनमोहन के ढिंग जामें हम।
वृन्दा के वन में वृन्दा२ की हालत अच्छी नाँय॥

गोप-गोपिका-गैया-बछरा-हरियाली-परबत।
नटनागर तेरे कुनबा की हालत अच्छी नाँय॥ 

बस इतनौ सन्देस कोऊ कनुआ तक पहुँचाऔ। 
श्याम! कदम्बन की छैंया की हालत अच्छी नाँय॥ 

सूधे-सनेह के मारग सों ऐसे-ऐसे गुजरे। 
मिटौ तौ नाँय मगर रस्ता की हालत अच्छी नाँय॥ 

झूठे-झकमारे लोगन की ऐसी किरपा भई।  
आज सत्यभाषी बट्टा३ की हालत अच्छी नाँय॥ 

जो'उ 'नवीन' उपाय है सकें, करने'इ होमंगे। 
भैया! अपनी ब्रजभासा की हालत अच्छी नाँय॥ 

१ यमुना २ वृन्दा यानि तुलसी का वन वृन्दावन ३ दर्पण


नवीन सी चतुर्वेदी 
ब्रज-गजल

ब्रज गजल - ब्रज भूषण चतुर्वेदी 'दीपक'

Braj Bhushan Chaturvedi Deepak's profile photo
ब्रज भूषण चतुर्वेदी 'दीपक' 

मन में जब सौं आन बसी है 
तेरी प्रीत सयानी सी ।
बिन बदरा के सावन बरस्यौ
दुनियाँ लगै दिवानी सी ।
बिना फूंक के बजी बंसुरिया 
नैया बिन पतवार चली ।
बिना पवन के नील गगन में
धुजा लगी फहरानी सी ।
हर मौसम मधुमास है गयौ 
हर आँगन ज्यौं फुलवारी ।
बाग़ बगीचन ओढ़ लई है 
आज चुनरिया धानी सी ।
भरे गाम के ताल तलैया 
बिन चौमासे झर लागे ।
कीच भई है आँगन आँगन
प्रीत रीत उमगानी सी ।
धरती अम्बर दिसा दिसा सब
तेरी सी उनिहार लगै ।
पूरी दुनियां दीखै तेरी मेरी 
प्रेम कहानी सी ।
ब्रज भूषण चतुर्वेदी ‘दीपक’
8057697209

ब्रज गजल

ब्रज गजल - नवीन

फोकट में भन्नाय रए हौ - हत का ऐ। 
खुद्द'इ गाल बजाय रए हौ - हत का ऐ॥
ज्ञानि'न कों भरमाय रए हौ - हत का ऐ। 
घी कों तेल बताय रए हौ - हत का ऐ॥
किसमत सों हीरा पायौ सो फेंक दियौ। 
मोति'न पै मगराय रए हौ - हत का ऐ॥
सैमइ कों तौ देखत ही म्हों फेरत हौ। 
चख-चख मैगी खाय रए हौ - हत का ऐ॥
बाहर बोलत हौ रोटि'न के लाले हैं। 
भीतर पाग पगाय रए हौ - हत का ऐ॥
जा कों देखत उलटी आवत हैं, ता कों। 
जमना में पधराय रए हौ - हत का ऐ॥
गोवरधन की महिमा हू बिसराय दई। 
सपरेटा चढवाय रए हौ - हत का ऐ॥
जहँ तुलसी कौ राज रह्यौ उन कुंज'न में। 
कंकरीट बिछवाय रए हौ - हत का ऐ॥
लक्ष्मी, काली, दुर्गा मैया के भगतौ।
बेटि'न कों बिदराय रए हौ - हत का ऐ॥
गैया कों मैया मानौ हौ तौ फिर चों। 
कट्टीघर खुलवाय रए हौ - हत का ऐ॥
ऐ 'नवीन' जी हम कों तौ बस यै बतलाउ। 
विजया कब छनवाय रए हौ - हत का ऐ॥

नवीन सी. चतुर्वेदी


ब्रज गजल