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हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै - नवीन

हवा चिरचिरावै है, ब्योम आग बरसावै,
जल हू जरावै - जान - इन सों बचाय दै

केवड़ा, गुलाब और चन्दन की लाग दै कें
खिरकी झरोखन में खस लगवाय दै

आगरे कौ पेठौ लाय ल्होरे टुकड़ा कराय
बर्फ सङ्ग ताहि कोरे कुल्ला में धराय दै

एक उपकार और कर दै 'नवीन' प्यारे
अपनी बगल नेंक परें सरकाय दै

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

ग्वाल कवि [1879-1981]

पिंगल आधारित ब्रजभाषा काव्य साहित्य ने अपनी अंजुमन में हर तरह के बयानात को पनाह दी है। आइये आज मथुरा के अपने समय के प्रख्यात कवि 'ग्वाल' जी [1879-1981] के कुछ कवित्त पढ़ते हैं।