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SP2/3/3 सौरभ पाण्डेय जी एवं श्याम गुप्त जी के छन्द

नमस्कार।

इण्टरनेट की समस्या सिर्फ़ छोटे शहरों-कस्बों या गाँवों में ही नहीं कभी-कभी महानगर में भी अपना परिचय देती रहती है। तीन दिन के टूर पर जाने से पूर्व सोचा बुधवार रात को एक पोस्ट शेड्यूल करता चलूँ, परन्तु एन मौक़े पर इण्टरनेट बाबा खूँटे से खुल गये और पोस्ट लेट हो गयी। इण्टरनेट बाबा को खूँटे से खुलता हुआ न देखा हो तो कभी अपने इण्टरनेट स्विच / राउटर की लाइट्स को बिगड़ने के दौरान कुछ-कुछ दोलक की तरह इधर-उधर होते देखियेगा, खूँटे से खुलने की बात समझ आ जायेगी।

साथियो आप इस मञ्च से जुड़े दो विद्वानों श्री सौरभ पाण्डेय [09919889911] जी और श्री श्याम जी को पढ़ते रहे हैं, आज की पोस्ट में ये दौनों रचनाधर्मी अपने कौशल्य के साथ हाज़िर हैं। पहले हम पढ़ते हैं सौरभ जी के छन्द 

’मैं-तुम’ के शुभ योग से, ’हम’ का आविर्भाव
यही व्यष्टि विस्तार है, यही व्यष्टि अनुभाव
यही व्यष्टि अनुभाव, ’अपर-पर’ का संचेतक   
’अस्मि ब्रह्म’ उद्घोष, ’अहं’ का धुर उत्प्रेरक
’ध्यान-धारणा’ योग, सतत संतुष्ट रखे ’मैं’
’प्रेय’ क्षुद्र व्यामोह, ’श्रेय’ निर्वाह करे ’मैं’

’तुम’ ऊर्जा, ’तुम’ प्राणवत, ’तुम’ ’मैं’ का विस्तार
गहन भाव संतृप्त यह, मानवता का सार
मानवता का सार, सदा जग ’तुम’ से सधता
’मैं’ कारक का सूच्य, जगत तो ’तुम’ से चलता
बहु-धारक का भाव, जिये ज्यों खगधारी द्रुम
संज्ञाएँ प्रच्छन्न, धारता हर संभव ’तुम’

’हम’ अद्भुत अवधारणा, ’हम’ अद्भुत संज्ञान
यह समष्टि के मूल का अति उन्नत विज्ञान
अति उन्नत विज्ञान, व्यक्तिवाचक का व्यापन
उच्च भाव संपिण्ड, ’अहं’ का भाव समापन
उच्च मनस का हेतु, ’भाव-कर्ता’ पर संयम
स्वार्थ तिरोहित सान्द्र, तभी हो ’मैं-तुम’ का ’हम’

हर रचनाधर्मी अपने स्वभाव और रुचि के अनुसार रचना रचने के लिये स्वतंत्र है और साहित्य इसी डगर पर चलते हुये हम तक पहुँचा है। अनादि काल से कई रचनाधर्मी अन्तर्मन के गूढ रहस्यों को अपनी लेखनी के कौशल्य से सुलझाते रहे हैं। रचनाधर्मी रचना को अपनी सन्तान की तरह समझते हैं इसलिए अपनी सन्तान को तैयार करने में कोई कोताही नहीं बरतते। अपने तईं रचना में अपने अनुभवों को उँड़ेलते रहते हैं। साहित्य में हर रचनाधर्म का स्वागत होता आया है। सौरभ जी के छंदों को पढ़ कर हृदय शून्य में स्थित तत्व के और अधिक निकट पहुँच जाता है। आप को बहुत-बहुत बधाई।

पोस्ट के दूसरे छंदानुरागी साथी हैं श्याम जी [9415156464] :-

‘मैं’ औ ‘तुम’ हैं एक ही, उसके ही दो भाव ,
जो मिलकर बन जाँय ’हम’, हो मन सहज सुभाव |
हो मन सहज सुभाव, सत्य शिव सुन्दर हो जग,
सरल सुखद, शुचि, शांत सौम्य हो यह जीवन मग |
रहें ‘श्याम’ नहिं द्वंद्व, द्वेष, छल-छंद जगत में,
भूल स्वार्थ ‘हम’ बनें एक होकर ‘तुम’ औ ‘में’  ||

तुम मैं प्रभु! हैं एक ही, लोकनाथ हम आप |
बहुब्रीहि हूँ नाथ मैं, आप तत्पुरुष भाव |
आप तत्पुरुष भाव, लोक के नाथ सुहाए ,
लोक हमारा नाथ, नाथ मेरे मन भाये |
खोकर निज अस्तित्व, मुक्ति पाजाऊँ जग में,
मेरा ‘मैं’ हो नष्ट, लीन होजाए तुम में ||

हम तुम मैं वह आप सब उस ईश्वर के अंश,
फिर कैसा क्यों द्वंद्व दें, इक दूजे को दंश |
इक दूजे को दंश, स्वार्थ अपने-अपने रत ,
परमार्थ को त्याग, स्वयं को ही छलते सब |
अपने को पहचान दूर होजायं सभी भ्रम,
उसी ईश के अंश, श्याम’ सब मैं वह तुम हम ||

सौरभ जी और श्याम जी दौनों हमारे वरिष्ठ साथी हैं और जानकार भी हैं। इस के अलावा पूर्व के अनुभवों के कारण इन दौनों साथियों के छन्द यथावत प्रस्तुत किये गये हैं। श्याम जी ने भी “मैं, तुम और हम” की मीमांसा करने के लिये सभी संदर्भित शब्दों का भरपूर प्रयोग किया है। इस पोस्ट के छह छन्द और विशेष कर सौरभ जी के तीन छन्द यादगार रहेंगे, हाँ..... लेकिन शब्दकोश की सहायता के साथ। श्याम जी और सौरभ जी आप दौनों मञ्च के पुराने साथी हैं इसलिए थोड़ा सा हास्य प्रयोग कर लिया है। आशा करता हूँ इसे पढ़ते हुये मेरी तरह आप के चहरे पर भी मुस्कुराहट होगी। मञ्च पर अपनी यादगार निशानी अंकित करने के लिये आप दौनों का बहुत-बहुत आभार ।

तो साथियो! आनन्द लीजियेगा इन छंदों का, उत्साह वर्धन कीजियेगा अपने साथियों का और हम बढ़ते हैं अगली पोस्ट की ओर।

विशेष: आयोजन अगर लम्बा चलता है तो बाद की पोस्ट्स को पाठक कम मिलते हैं। इसलिए सभी साथियों से निवेदन है कि अपने-अपने छन्द यथाशीघ्र भेजने की कृपा करें। और भाई कोई ज़रा रस परिवर्तन की जोख़िम भी उठाओ :)


नमस्कार

SP2/2/10 तू मुझमें बहती रही, लिये धरा-नभ-रंग - सौरभ पाण्डेय


नमस्कार

पिछले एक हफ़्ते में दो बार यह ब्लॉग अन्तरिक्ष के हवाले हो गया यानि अन्तरर्ध्यान हो गया यानि ‘Blog not found’ जैसा मेसेज आया। मेरे साथ यह पहली बार हुआ है इस लिए समझ नहीं पा रहा हूँ कि यह एक सामान्य तकनीकी समस्या है या कोई असामान्य करतूत। ब्लॉग पर तीन सालों में जो सामग्रियाँ इकट्ठा की हैं उन्हें ले कर चिन्तित होना स्वाभाविक भी है। आप में से जिन के लिये सम्भव हो, इस विषय पर मेरा मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

साथियो, सौरभ पाण्डेय जी से हम में से अधिकतर लोग परिचित हैं। तत्व आधारित चिन्तन इन की विशेषता है। मञ्च के निवेदन पर इन्होंने चिन्तन-परक दोहे भेजे हैं। बेशक़ साहित्य का सहज व सरस पक्ष ही  अधिक चर्चा में रहता है, परन्तु किसी को तो गूढ बातें बतियाने के लिये आगे आना होता है। सौरभ जी ने हमारे निवेदन पर यह ज़वाबदारी ख़ुद उठाई है। आइये पढ़ते हैं सौरभ पाण्डेय जी के दोहे

तू  मुझमें  बहती  रही, लिये धरा-नभ-रंग
मैं    उन्मादी   मूढ़वत,   रहा  ढूँढता  संग

सहज हुआ अद्वैत पल,  लहर  पाट  आबद्ध
एकाकीपन साँझ का, नभ-तन-घन पर मुग्ध

होंठ पुलक जब छू रहे,   रतनारे   दृग-कोर
उसको उससे ले गयी,  हाथ पकड़ कर भोर

अंग-अंग  मोती  सजल,  मेरे तन पुखराज
आभूषण बन छेड़ दें,  मिल रुनगुन के साज

संयम त्यागा स्वार्थवश,  अब  दीखे  लाचार
उग्र  हुई  चेतावनी,  बूझ  नियति  व्यवहार

जैसा कि मैं ने कहा कि किसी को तो कठिन कार्य को हाथ में लेना होता है सो यह दायित्व भाई सौरभ जी ने वहन किया जिस के लिये उन का बहुत-बहुत आभार। पहले दोहे में ‘कस्तुरी कुण्डल बसे’ से जो चिन्तन शुरू हुआ है वह अन्तिम दोहे के सामयिक चिन्तन तक पुरअसर है। सौरभ जी को बहुत-बहुत बधाई। तो साथियो प्रयास कीजिये इन दोहों की सघनता तक पहुँचने का, अपने सुविचार व्यक्त कीजिएगा और मैं बढ़ता हूँ अगली पोस्ट की तरफ़। 


इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें   
 
**** शेखर चतुर्वेदी जी अपरिहार्य कारणों से पोस्ट अटेण्ड नहीं कर पा रहे हैं, स्वाथ्य लाभ होते ही पोस्ट्स पर हाज़िर होंगे।

भटकाव के प्रारूप दो ही, क्लिष्ट और अक्लिष्ट हैं

सभी साहित्य रसिकों का अभिवादन



बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम।।

सरल भावार्थ - बुद्धियुक्त मनुष्य इस जीवन में ही अपने आप को अच्छे-बुरे कर्म / फल से मुक्त कर लेता है। चूंकि सभी कर्मों में यही योग [कर्म प्रयास] उत्तम / कुशल है, इसलिए इसी योग [कर्म प्रयास] के लिए जुट जाना चाहिए।
  (सन्दर्भ - श्रीमद्भग्वद्गीता - अध्याय २ श्लोक ५०)


कितनी छोटी पर कितनी गहन बात। इस मंच पर आज पहली बार पधार रहे हैं आदरणीय सौरभ पाण्डेय जी। नैनी, इलाहाबाद को अपने संस्कारों में सहेजे माटी के सपूत और अपनी जननी को गौरवान्वित करने वाले इस व्यक्तित्व का परिचय आप स्वयं उन के छंदों के माध्यम से प्राप्त करें।

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'कसौटी' जिन्दगी की


[सौरभ जी के इन छंदों को कपिल दत्त की आवाज़ में सुनें]

यह 'सत्य', 'निज अन्तःकरण' का - 'सत्व-भासित ज्ञान' है। 
मन का कसा जाना, कसौटी - पर 'मनस-उत्थान' है।।
जो कुछ मिला है आज तक, क्या - है सुलभ? बस होड़ से। 
इस जिन्दगी की राह अद्भुत, प्रश्न हैं हर मोड़ से ।१। 

अब नीतियाँ चाहे कहें जो, सच मगर है एक ही। 
जब तक न हो मन स्वच्छ-निर्मल, दिग्भ्रमित है मन वही।। 
रंगीन जल है ’क्लेष’ मन का, ’काम’ भी जल, पात्र का। 
परिशुद्ध जल से, पात्र भरना, कर्म हो, जन मात्र का ।२।   

जिससे सधे उद्विग्न मन, वह, ’संतुलन’ का ज्ञान है। 
फिर, सुख मिले या दुख मिले, हो शांत मन, कल्याण है।। 
जन साध ले मन ’संतुलन’ में, निष्ठ हो, शुभता रसे। 
मन-पात्र दूषित जल भरा, तो, हीनता-लघुता बसे ।३। 

भटकाव के  प्रारूप दो ही,  'क्लिष्ट' और 'अक्लिष्ट' हैं। 
छूटे न यदि 'भटकन' सहज ही, मानिये वे 'क्लिष्ट' हैं ।।  
'जनहित' परम हो लक्ष्य जिनका, चित्त से 'उत्कृष्ट' हैं। 
जिनमें समर्पण ’तपस’ के प्रति, 'जन' सभी वे 'शिष्ट' हैं ।४। 

प्रति-पल, परीक्षित - आदमी है, साधना - हरक्षण चले। 
यह ताप ही - 'तप' साधता है, दिव्य हो - तन-मन खिले।। 
उन्नत-तपस से - शुद्ध हो मन, भक्ति है, उद्धार है। 
भव-मुक्ति है, आनन्द है, शुभ - प्रेम का संसार है।५।





अद्भुत,अप्रतिम - इस के सिवा और क्या कहें?????????????? आ. सौरभ जी ने इस विषय पर एक संक्षिप्त विवेचन भी प्रस्तुत किया है, आइये पढ़ते हैं उन्हीं के शब्दों में :-


पतंजलि अपने योगसूत्रों के माध्यम से व्यक्ति के सर्वांगीण उत्थान की बात करते हैं। ताकि अन्नमय स्तर में जीता हुआ एक व्यक्ति अपने होने के उद्येश्य परम-सत्य को पा सके और आनन्दमय कोष के स्तर को जी सके। अष्टांग योग में अपने को शरीर, मन और विचार के तौर पर साधने से लेकर सामाजिक रूप से साधने की बात करता है। यहाँ शरीर मात्र बाह्य रूप का स्थूल प्रारूप न हो कर मनस का सूक्ष्म प्रारूप भी होता है साथ ही साथ उसके होने का अर्थ भी उसके शरीर का हिस्सा माना जाता है, जिसे कारण शरीर या सूक्ष्मातिसूक्ष्म प्रारूप कहते हैं।

मानव-मन व्यक्तित्व का अंतःकरण है जिसके चार अवयव होते हैं, मनस, चित्त, बुद्धि तथा अहंकार। यहाँ अहंकार व्यक्ति की अस्मिता है -उसके होने का भाव। मनस, मन के पट का प्रतिरूप है, जहाँ चित्त के भण्डारण में समस्त चाही-अनचाही स्मृतियाँ विद्यमान होती हैं। यह किसी पात्र की तरह अनुभवों, अनुभूतियों और स्मृतियॊं का संग्राही होता है। यह बुद्धि ही है जो विवेक की छननी से आवश्यक को स्वीकार कर अनावश्यक को विस्मृत कर त्यागने देती है और चित्त से उनका लोप हो जाता है। यहाँ ज्ञातव्य है कि बुद्धि का पैनापन और उसका संतुलित स्तर, न कि आवश्यकता के अनुरूप चाहना, आवश्यक और अनावश्यक का निर्धारण करता है।  यही उच्च अवस्था है।  मनस को विचार प्रभावित करते रहते हैं। उन विचारों का सकारात्मक या नकारात्मक होना चित्त मॆं तदनुरूप स्मृतियों का होना तय करता है। विचारों के उमगने का कारण वृत्तियाँ होती हैं। विचार वृत्तियों से प्रभावित हो कर सकारात्मक या नकारात्मक (अच्छे या बुरे) हो जाते हैं।  यदि आसानी से विचारों में परिशुद्धि हो जाय तो वृत्तियाँ अक्लिष्ट कहलाती हैं अन्यथा वृत्तियाँ क्लिष्ट हुईं। इन क्लिष्ट वृत्तियों का परिशोधन निरन्तरता के साथ दीर्घकालिक प्रयास की मांग करता है। (पतंजलि योग सूत्र/ समाधि पाद/ सूत्र - ५ और १४)

यदि बुद्धि से मन सध जाय तो इस अवस्था को मन का संतुलन कहते हैं, जहाँ मन हर हाल में विवेकजन्य ठहराव लिये हुए होता है. सुख या दुख में अतिरेक नहीं होता। इस अवस्था को प्राप्त करने की प्रक्रिया ही योग है (श्रीमद्भग्वद्गीता - अध्याय २ श्लोक ५०) .

इस अवस्था के अनुरूप ही सत्य की समझ बनती है। यह अवश्य सत्य एक है और मूल है किन्तु मानसिक संतुलन के अनुसार उसका आभास होता है। एक स्तर और अवस्था के दो व्यक्ति एक जैसे विचारवान होते हैं। उनके लिये सत्य की समझ एक जैसी होती है। यही कारण है कि सत्य अपने कई रूपों में स्वयं को आभासित करता प्रतीत है। यह शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक तपस ही है जो किसी व्यक्ति को इन अनुभूतियों और प्रक्रिया के लिये तैयार करता है। इस प्रकार, तप शरीर को कष्ट देने की प्रक्रिया नहीं बल्कि सत्य को प्राप्त कर प्रेम और आनन्द के संसार जीने के लिये सर्वांगीण रूप से साधने की प्रक्रिया है।

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गूढ बातों को सहजता से विवेचित करने में माहिर सौरभ जी के छंदों पर भला क्या कहें। नि:शब्द। अपने लिए तो जैसे कि गूंगा रस का आनंद लेता है पर कह नहीं पाता; बस कुछ ऐसे ही इन छंदों का रसास्वादन जारी है। आप इन छंदों तथा इन छंदों के शिल्पी से दो चार होइए, अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करिए  तब तक हम तैयारी करते हैं अगली पोस्ट की।

कुछ रचनाधर्मियों ने इस छंद पर हास्य-व्यंग्यातमक, क्षृंगारिक और कुछ अन्य चुटीले सामाजिक जीवन विषयक विषयों पर छंद लिखना आरम्भ किया है। प्राप्त होते ही उन के भी छंद पढ़ेंगे हम एक एक कर के।



[छंदों के साथ ऑडियो फाइल्स [एम्बेड कोड के साथ या सिवाय, जैसा भी हो] का भी स्वागत है| इस विषय में यदि कोइ शंका हो तो ई मेल के द्वारा पूछने की कृपा करें]

जय माँ शारदे!