दोहे - रवि यादव ’रवि‘

 


दो नैनों ने मान ली, दो नैनों की बात

दो जोड़ी नैना जगें, सारी सारी रात

 

कच्ची मिट्टी ले रही, अगर ग़लत आकार

मिट्टी नहीं कुम्हार है, इसका ज़िम्मेदार

 रीता रीता हो गया, तब से मेरा गाँव

पिछली पीढ़ी की गयी, जब से सर से छाँव

 

समाचार दिखला रहा, केवल नफ़रत, द्वेष

बचा नहीं क्या देश में, कुछ भी अच्छा शेष

 

मिलकर जुड़कर टूटकर, देखा कितनी बार

लेकिन तेरे बाद फिर, जमा नहीं संसार

 

जिन रिश्तों ने खो दिए, आपस के संवाद

गर्माहट वो प्यार की, कर बैठे बरबाद


धन हाथों का मैल है, बस कहने की बात

मैला होने के लिये, दौड़े जग दिन रात

 

खुली आँख तक खेल है, दुनिया दौलत धाक

आँख ज़रा झपकी नहीं, सब मिट्टी सब ख़ाक

1 टिप्पणी:

  1. रवि जी आपने इन दोहों में जीवन को बहुत सहज, शांत और सच्चे भाव से रखा है। आपकी पंक्तियाँ शोर नहीं करतीं, बल्कि मन के भीतर उतरकर धीरे से अपनी बात कहती हैं। प्रेम, रिश्ते, गाँव, समाज और धन—सब कुछ आपके यहाँ संवेदना और अनुभव के साथ सामने आता है।
    आप दोषारोपण नहीं करते, केवल सोचने की जगह छोड़ते हैं। भाषा सरल है, पर अर्थ गहरे हैं। यही सादगी इन दोहों को प्रभावशाली बनाती है। पाठक इनमें अपने समय और अपने मन की परछाईं देख लेता है।
    ये दोहे कम शब्दों में बहुत कुछ कह जाने वाली, परिपक्व और शालीन रचनाएँ हैं—जो पढ़कर चुपचाप मन में ठहर जाती

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