पुर्णिमा वर्मन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
पुर्णिमा वर्मन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

SP/2/2/1 धूल-धूल होता रहा, पगडण्डी का नेह - पूर्णिमा वर्मन



किसी कार्य के निष्पादन के प्रथम चरण को श्री गणेश कहा जाता है। बहुत-बहुत-बहुत आधुनिक होने के बावजूद हम लोग परम्परावादी हैं तो हैं। किसी भी कार्य के श्री गणेश के वक़्त एन्श्योर करते हैं, अच्छा माहौल हो, अच्छी बातें हों वग़ैरह वग़ैरह...... । तो पूर्णिमा वर्मन जी के दोहों से बढ़ कर शुभ सगुन और क्या होगा - इस आयोजन के श्री गणेश के लिये। पूर्णिमा वर्मन...... एक ऐसा व्यक्तित्व जो लगातार साहित्य सेवा में तल्लीन है, निस्वार्थ भाव से गूगल महाराज / विकी बाबा को हज़ारों पृष्ठ समर्पित कर चुका है तथा छोटे-बड़े का भेद रखे बग़ैर निरन्तर साहित्योत्थानार्थ सम्यक प्रयासों में संलग्न रहता है। आइये शुरुआत करते हैं आयोजन की.....

कहते कहते रुक गई, पीपल वाली छाँव
क्यों उदास होने लगे, उत्सव वाले गाँव

आसमान में भर गई, कर्फ्यू वाली धूप
सहमा सहमा सा लगे, गुलमोहर का रूप

सोने वाली बज रही, दोपहरी की झाँझ
अमलतास पर झूलता, मौन अगोरे साँझ
अगोरना - प्रतीक्षा करना 

दिन पछाँह की हेठियाँ, लू लश्कर के साथ
चाँदी वाला मन लिये, रात फेरती हाथ

धूल-धूल होता रहा, पगडण्डी का नेह
मृगतृष्णा गढ़ती रही, सड़कों वाली देह

शहरों में बसने लगे, सुविधा वाले लोग
माटी वाले प्यार में, लिखा रहा बस जोग

अद्भुत, अनुपम, अति-सुन्दर................ किस दोहे की तारीफ़ करें और किसे छोड़ दें। बेहद उम्दा..... वाह वाह वाह। इन दोहों के शिल्प का मनन करते हुये मन अघाता नहीं है..... विलक्षण दोहे। प्रति-एक दोहा हम से सीधे सम्वाद स्थापित कर रहा है। शब्दों का चयन, वाक्यों का गठन और कथ्य की निष्पत्ति.... वह भी सुगम सरस..... हर एंगल से ये दोहे पाठक को आकर्षित करने में सक्षम हैं। मुझे पूर्ण विश्वास है ये दोहे आप को भी अपने साथ बहा ले जायेंगे। तो आनन्द लीजिये इन दोहों का, अपने विचारों से अवगत कराइये पूर्णिमा जी को और मैं आज्ञा लेता हूँ अगली पोस्ट की तैयारी के लिये।

प्रणाम...... 

इस आयोजन की घोषणा सम्बन्धित पोस्ट पढ़ने के लिये यहाँ क्लिक करें
आप के दोहे navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें

दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - पूर्णिमा जी और निर्मला जी [1-2]

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

लो आ गयी बेला दोहा छंद पर दूसरी समस्यपूर्ति के श्री गणेश की| सर्व प्रथम, चौपाई छंद पर पहली समस्या पूर्ति पर अपनी अपनी रचनाएँ भेजने वाले एवं उन रचनाओं पर अपनी टिप्पणी रूपी पुष्पों की वर्षा करने वाले सभी कला प्रेमियों का अभिनंदन|

पहली समस्या पूर्ति का अनुभव काफी उत्साह प्रद रहा, बस एक छोटी सी बात जो दिल में खटकी थी, वो थी नारी शक्ति की अनुपस्थिति| माँ शारदे ने इस बार हमारी प्रार्थना सुन कर पहली दो पूर्तियाँ महिलाओं द्वारा ही भिजवाई हैं|


Purnima Varman

अनुभूति, अभिव्यक्ति एवं नवगीत की पाठशाला यानि पूर्णिमा वर्मन जी| अंतर्जाल पर साहित्य के प्रति आपके समर्पण को भला कौन नहीं जानता| सब से पहले आपके दोहे प्राप्त हुए हैं| तो आइये पढ़ते हैं पुर्णिमा जी के दोहे:-

जोश, जश्न, पिचकारियाँ, अंबर उड़ा गुलाल|
हुरियारों की भीड़ में, जमने लगा धमाल|1|

शहर रंग से भर गया, चेहरों पर उल्लास|
गली गली में टोलियाँ, बाँटें हास हुलास|2|

हवा हवा केसर उड़ा, टेसू बरसा देह|
बातों में किलकारियाँ, मन में मीठा नेह|3|

ढोलक से मिलने लगे, चौताले के बोल|
कंठों में खिलने लगे, राग बसंत हिँदोल|4|

मंद पवन में उड़ रहे, होली वाले छंद|
ठुमरी, टप्पा, दादरा, हारमोनियम, चंग|5|

नदी चल पड़ी रंग की, सबका थामे हाथ|
जिसको रंग पसंद हो, चले हमारे साथ|6|

घर घर में तैयारियाँ, ठंडाई पकवान|
दर देहरी पर रौनकें, सजेधजे मेहमान|7|

नगर नगर झंकृत हुआ, दुनिया हुई सितार|
सर पर चढ़कर बोलता, होली का त्यौहार|8|

मन के तारों पर बजे, सदा सुरीली मीड़|
शहरों में सजती रहे, हुरियारों की भीड़|9|

होली की दीवानगी, फगुआ का संदेश|
ढाई आखर प्रेम के, द्वेष बचे ना शेष|10|



My Photo
दूसरी समस्या पूर्ति मिली है आदरणीय निर्मला कपिला जी से| वर्ष 2009 में श्रेष्ठ कहानी के 'संवाद' पुरस्कार तथा वर्ष 2010 के लोक संघ परिकल्पना सम्मान [कथा-कहानी] को प्राप्त करने वाली आदरणीया निर्मला जी के ब्लॉग वीर बहूटी से हम में से अधिकांश लोग परिचित हैं| उन के अनुसार उन्होने जीवन में पहली बार ही दोहे लिखे हैं| ओहोहोहों निर्मला जी आप के जीवट को सादर प्रणाम| आइये पढ़ते हैं उन के दोहे:-


लाज शर्म को छोड कर, लगी पिया के अंग|
होली खेली प्रीत से, देख हुये वो दंग|1|

होली होली खेलते, लाल हुये हैं गाल|
सडकों पर करते युवा, देखो खूब धमाल|2|

होली के त्यौहार पर, झूमें गायें लोग|
घर घर मे हैं पक रहे, मीठे छ्प्पन भोग|3|

कोयल विरहन गा रही, दर्द भरे से गीत|
रंग लगाऊँ आज क्या, दूर गये मन मीत।|4|

होली के त्यौहार पर, सखियाँ करें पुकार|
होली खेलो साथ मे, लला श्याम सुकुमार|5|

धूम मची चारों तरफ, होली का त्यौहार|
कौन करे बिन साजना, रंगों की बौछार|6|

समस्या पूर्ति की पंक्ति को आपने 2 रूपों में 3 स्थानों पर प्रयोग में लिया है| क्या बात है निर्मला जी|

तो देखा, कितने सुंदर दोहे भेजे हैं इन दो कवियत्रियों ने| अब आप की बारी हैं इन दोहों पर प्रशंसा के पुष्पों की वर्षा करने की| आपके दोहों की प्रतीक्षा है| जानकारी वाली लिंक एक बार फिर रेडी रिफरेंस के लिए:- समस्या पूर्ति: दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - घोषणा|