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SP/2/1/10 नींद चुरा ले ख्वाब जो, उस से कर ले प्यार - संजय मिश्रा 'हबीब'

सभी साहित्यरसिकों का सादर अभिवादन


शायद आप को भी आश्चर्य न होगा क्योंकि आप ने भी अपने बचपन में अपने घर-परिवार-पड़ौस में ऐसे कुछ एक पुरुषों-महिलाओं को अवश्य ही देखा-सुना होगा जो बातों-बातों में ही दोहे गढ़ देते थे। उस से पहले भी अगर ग़ौर करें तो कहा जाता है कि हिंदुस्तान में तोते संस्कृत के श्लोक बोलते थे, जो आदत डलवा दी जाये वो आदत पड़ जाती है। दोहे हमारी धमनियों में हैं बस अन्तर सिर्फ़ इतना ही है कि हम [आज के इंसान] उपदेशक या विदूषक या निंदक मात्र हो कर रह गए हैं। कोमल भावनाओं को कैसे पहिचाना जाये इस का पैमाना हम से विलग हो गया है। तकलीफ़ होती क्या है अस्ल में, दरअस्ल हमें पता ही नहीं है। छुट-पुट झटकों को भी बड़ी दुर्घटना की तरह परोसते माध्यमों को दोष देने की बजाय बेहतर है कि हम ख़ुद ही आत्म-चिन्तन करें। समस्या-पूर्ति मंच के दूसरे चक्र के पहले आयोजन का उद्देश्य यही था और अब तो इसे अगले आयोजनों में आगे बढ़ाना [सब की सहमति के साथ] और भी ज़ियादा जुरुरी लग रहा है।

वर्तमान आयोजन की 10 वीं पोस्ट में पढ़ते हैं मंच के 39वें सहभागी संजय मिश्रा 'हबीब' के शानदार दोहे:- 

संजय मिश्रा 'हबीब'

ठेस-टीस
मैया सपने कातती, तकली बन नौ माह
बिटवा दिखला दे उसे, वृद्धाश्रम की राह