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आउते बसंत कंत संत बन बैठे री - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

चाँह चित चाँहक की चाँहि कें चतुर चारु,
चाउ ते चली कर चरचित इकैठे री

पाउते सु 'प्रीतम' के हाव दरसाउ भूरि
भाउते करौंगी मिल मन के मनेंठे री

जाउते बिलोके तौ बरन कछु औरें बन्यौ