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चौथी समस्या पूर्ति - घनाक्षरी - पढ़ें और सुनें भी - लोग हमें कहते थे इश्क़ का बीमार है

सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन

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इस पोस्ट में एक विशेष घोषणा भी है, जिसे पढ़ना न भूलें
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यह पोस्ट दो दिन लेट है| इस बार हम औडियो क्लिप्स भी देना चाह रहे थे, इसलिए देरी हो गयी| इस बार की पोस्ट में आप घनाक्षरी छंदों को सुन भी सकते हैं| हम सब के चहेते तिलक राज कपूर जी ने अपनी आवाज में उन के छंदों को रिकार्ड कर के भेजा है और रविकान्त भाई के छंदों को मैंने अपनी आवाज में रिकार्ड किया है| अंतर्जाल पर यह मेरा पहला प्रयास है, और इस प्रयास पर आप लोगों के सुझावों का सहृदय स्वागत है|

तो आइये पहले हम पढ़ते हुए सुनते हैं तिलक राज जी के छंदों को|





तेरा-मेरा, मेरा-तेरा, बातें हैं बेकार की ये,
आप भी समझिये, उसे भी समझाइये|

वाद औ विवाद से, न सुलझा है कभी कुछ,
प्यार को बनाये रखे, 'हल' अपनाइये|

छोटी छोटी बातें बनें, बड़े-बड़े मतभेद,
छोड़ इन्हें पीछे, कहीं, आगे बढ़ जाइये|

ज्ञानीजन-गुणीजन, सभी ने बताया हमें,
राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइये||

[शायरी करने वाले लोग बखूबी जानते हैं ऊला और सानी का क्या और क्यों महत्व होता है|
थोड़ा स्पष्ट कर दें, घनाक्षरी के पहले दो चरण विषय को उपस्थित करते हैं, फिर तीसरा
चरण विषय को तान देता है और चौथा वाला चरण 'सटाक' की आवाज के साथ
न सिर्फ छन्द समापन करता है बल्कि उक्त विषय पर निष्कर्ष भी दे देता है|
यहाँ गिरह बाँधने वाली बात भी खास महत्व रखती है]

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तिलक भाई के आदेशानुसार इस छन्द के साथ फोटो भी जोड़ा गया है


image.png


नयना हैं कजरारे, केश घटा ने सँवारे,
वक्ष कटि से कटा रे, कलियों सी काया है|

गोरे गाल तिल धारे, अधर गुलाब प्यारे,
इन्द्र की सभा से तुझे कौन खींच लाया है|

अधर अधीर कहें, बड़े ही जतन कर,
काम के लिए रति ने तुझको सजाया है|

बदली की ओट से निहारता कनखियों से,
देख तेरी सुंदरता, चाँद भी लजाया है||

['कनखियों से'............... नीरज भाई की स्टाइल में बोले तो आप तो उस जमाने में
पहुँचे ही, हम सभी को भी दशकों पीछे ले गए हो भाई साब| हाए हाए हाए,
वो कनखियों वाला किस्सा आप के साथ भी रहा है,
पता नहीं था हमें!!!!!!!!!!]


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हमने भी सोचा, चलो - उस से ही शादी करें,
जिस पे फिदा ये सारा, नगर-बाज़ार है|

अम्मा-बापू-भाई-भाभी, कोई नहीं माना कभी,
सब को लगा कि छोटा-मोटा ये बुखार है|

उस को निहारते थे, खिड़की के तले खड़े,
लोग हमें कहते थे इश्क़ का बीमार है|

घोड़ी पर चढ़ कर, उसे देखा, जाना तभी,
बन्नो का बदन जैसे क़ुतुब मीनार है||

[क्या बात करते हैं............. आप भी.........!!!!! फिर क्या हुआ? कैसे पिण्ड छूटा?
या अभी भी उस रोग से ग्रस्त हैं आप भाई साब? चलो अब इस घनाक्षरी
को जो एक बार भी पढ़ लेगा, खिड़की के अंदर जा कर डिटेल में
जरूर देखेगा, मान्यवर]




और अब पढ़ते हैं उन्हें - जो छंदों से प्राणों से भी अधिक प्यार करते हैं| श्लेष अलंकार वाली विशेष पंक्ति पर आपने एक नहीं दो-दो छन्द, और वो भी दो प्रकार के प्रयोगों के साथ प्रस्तुत किए हैं| मैंने इन छंदों को अपनी आवाज में रिकार्ड किया है, आशा है आप लोग मेरी आवाज की खराश को नज़र अंदाज़ कर देंगे|


:- रविकान्त पाण्डेय‍‍


पहला प्रयोग - अभंग श्लेष अलंकार



निज-निज प्रकृति के, सब अनुसार चलें,
विषम का किए प्रतिकार बिन चले ना|

बिन पुरुषार्थ कुछ, प्राप्त नहीं होता कभी,
ध्रुव सत्य बात ये स्वीकार बिन चले ना|

कुछ नहीं पूर्ण यहाँ, सब को तलाश कुछ,
नाव कोई जैसे पतवार बिन चले ना|

शिष्य को न नींद आए, मछली को शोक भारी,
पुरुष संताप ग्रस्त - 'नार' बिन चले ना||

[इस छन्द में रवि जी ने 'नार' शब्द के तीन अर्थ लिए हैं [१] ज्ञान [२] पानी और [३] स्त्री|
अभंग श्लेष का अर्थ होता है कि दिये / लिए गए शब्द को जैसे का तैसे ही लेना]


दूसरा प्रयोग - सभंग श्लेष अलंकार


प्रेम बिन रिश्तों वाली, गाड़ी नहीं चलती है,
घनघोर युद्ध, हथियार बिन चले ना|

वन-वन डोल-डोल मृग यही कहता है,
लगे प्यास जब, जलधार बिन चले ना|

आभूषण कितने भी सुंदर हों बंधु, पर,
स्वर्ण की दुकान तो 'सु-नार' बिन चले ना|

लाख हों हसीन मोड, इस की कहानी बीच,
जीवन का मंच सूत्रधार बिन चले ना||

[इस प्रयोग में रवि जी ने 'नार' शब्द को 'सु' से जोड़ कर दो भिन्न अर्थ उत्पन्न किए गए
हैं| यही होता है सभंग श्लेष अलंकार| यहाँ एक पंक्ति में कवि कह रहा है दो बातें-
जैसे कि [१] स्वर्ण की दुकान सुनार के बिना नहीं चलती| दूसरे अर्थ के साथ
[२] स्वर्ण की दुकान सुंदर नारी के बिना नहीं चलती| यही होती है कवि
की कल्पना| रवि भाई आप बीच बीच में गायब हो जाते हैं|
सो गाँठ बाँध लें, इस तरह से चलने वाला नहीं|
भाई साहित्य सेवा का मामला है]


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विशेष घोषणा
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ये सेकंड लास्ट पोस्ट है, अगली पोस्ट होगी 'समापन वाली पोस्ट'| आदरणीय आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' जी के परामर्श के अनुसार उस पोस्ट को 'विषय मुक्त' किया जा रहा है| कई सारे कवि / कवियात्रियों ने रचनाएँ भेजी हैं, कुछ परिष्कृत जैसी हैं, कुछ अलग विषय पर हैं और कुछ प्रथम प्रयास वाली हैं| आज के दौर में जिन लोगों ने बढ़ कर छन्द सृजन में रुचि दर्शाई है, मंच उन सभी को प्रस्तुत करना चाहता है| तो ये सारे रचनाधर्मी उस पोस्ट में आएंगे|

सिवाय इस के - इस समापन पोस्ट के लिए -
अन्य रचनाधर्मी भी विषय से इतर अपना कोई एक घनाक्षरी छन्द भेज सकते हैं| हिन्दी के अलावा यदि कोई साथी भोजपुरी, मैथिली, राजस्थानी, पंजाबी, सिंधी, ब्रजभाषा, गुजराती, मराठी जैसी अन्य भाषाओं के अतिरिक्त आंचलिक भाषाओं में भी छन्द भेजना चाहें तो उन का सहर्ष स्वागत है| भाषा संदर्भ के साथ साथ शब्दों के अर्थ अवश्य दें| आप अपनी औडियो क्लिप भी भेज सकते हैं| हमारी अपेक्षा रहेगी कि पाठक उस छन्द को सब से पहली बार यहीं पढ़ें| कारण स्पष्ट है कि हम जब पहले पहले कुछ पढ़ते हैं, तब हमारी स्वाभाविक प्रतिक्रिया अपने आप आती है| बाद में फोर्मेलिटी अधिक लगती है|

ये रचनाएँ जल्द से जल्द मंच तक [navincchaturvedi@gmail.com] पहुँच जाएँ, तो समापन पोस्ट को रुचिकर बनाने के लिए पर्याप्त समय मिल सकेगा|

इन छंदों के प्रकाशन के संबंध में एक और विशेष योजना भी है - जिस के बारे में समापन पोस्ट में बताया जाएगा, और आप सभी के सुझाव भी आमंत्रित किए जाएँगे|

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छंदों के प्रेमियो - कैसे लगे ये छन्द और कैसा चल रहा है आयोजन, लिखिएगा अवश्य|
हमें इंतज़ार है समापन पोस्ट के लिए आने वाली घनाक्षरियों का|

जय माँ शारदे!

दूसरी समस्या पूर्ति - दोहा - मयंक अवस्थी, रविकान्‍त पाण्‍डेय, शेखर चतुर्वेदी [१०-११-१२]

सभी साहित्य रसिकों का पुन: सादर अभिवादन और होली की शुभकामनाएँ

दोहा छन्‍द पर आधारित दूसरी समस्या पूर्ति के पाँचवे सत्र में आप सभी का सहृदय स्वागत है|

Mayank Awasthi

रंग-भंग-हुड़दंग सँग, हास-रास-श्रिंगार|
क्या-क्या ले कर आ गया, होली का त्यौहार|१|

सब के रँग में रँग सभी, गये इस तरह डूब|
आज विविधता में हमें, दिखी एकता खूब|२|

तेरे रँग में रँग गया, आज अंग प्रत्यंग|
और पृथकता घुल गई, अपनेपन के संग|३|

भाई मयंक अवस्थी जी ने चौपाई छन्‍द पर आधारित पहली समस्या पूर्ति में भी मनभावन चौपाइयाँ प्रस्तुत की थीं और इस बार भी उन्होने अपनी कलम की जादूगरी से हमें मंत्र मुग्ध कर दिया है| ग़ज़ल में महारत रखने वाले मयंक भाई की छन्‍दों पर पकड़ उन के ज्ञान और अनुभव का जीता जागता उदाहरण है|


होली में रितुराज ने किया धरा को तंग|
अंग-अंग पर मल दिया धानी-धानी रंग|१|

नदी पार था चूमता, सूर्य धरा के गाल|
लहरों ने टोका तभी, हुआ शर्म से लाल|२|

सरसों ने पहना दिया, पीत पुष्प परिधान|
धरती दुल्हन सी सजी, कोयल गाये गान|३|

बने प्रीत खुद गोपिका, मन हो नंद-कुमार|
उर-अंतर प्रतिक्षण मने, होली का त्यौहार|४|

फागुन आया, प्रीत की, रिमझिम पड़े फ़ुहार|
नस-नस में उठने लगा, दिव्य प्रेम का ज्वार|5|

'पी' सम्मुख हैं सुंदरी, कर ले पूरन काज|
कंठहार-सी लग गले, छोड़ जगत की लाज|6|

रविकान्‍त जी ने तो होली की जो अद्भुत छटा दिखलाई है हमें, उस की जितनी तारीफ की जाए, कम ही है| प्रकृति की होली के इस बेशक़ीमती नज़ारे ने इस मंच को और भी अधिक गरिमा प्रदान की है| दिल से यही आवाज़ आ रही है दोस्त कि माँ शारदा आप पर सदा मेहरबान रहें|



भंग रंग आनंद मय, होली का त्यौहार|
ब्रज भूमि की देखिये, आनंद छटा अपार|१|

सन्मुख राजाधिराज के, ढप ढोलक की थाप|
रंगों में मन डूब के, कर मन हरि का जाप|२|

ब्रजवासिन के संग में, नटवर नन्द किशोर|
भक्ति प्रेम का अमिट रँग, बरस रहा चहुँ ओर|३|

मन के कलुष मिटाय के, जीवन कर साकार|
बड़े भाग्य से आत है, होली सा त्यौहार|४|


इस सत्र के तीसरे कवि हैं शेखर चतुर्वेदी| शेखर भाई आपने मथुरा की द्वारिकाधीश [राजाधिराज] जी के साक्षात दर्शन करा दिए| छन्‍द साहित्य के प्रति आप का रुझान इस बार भी प्रभावित करने में सक्षम रहा है| इन के जैसे और भी कवियों / कवियत्रियों को इस मंच से जुड़ना चाहिए|

अगली पोस्ट में मिलेगे कुछ और कवियों के साथ| तब तक आप इन दोहों के रंगों में सराबोर हो कर होली का आनंद लीजिए और अपने टिप्पणी रूपी पुष्पों की वर्षा कीजिए||

आप सभी को रंगों के इस महापर्व की ढेरों बधाइयाँ|

खुशियों का स्वागत करे, हर आँगन हर द्वार|
कुछ ऐसा हो इस बरस, होली का त्यौहार||

छंद शास्त्र: एक संक्षिप्त परिचय - रविकान्त पाण्डेय

छंद शास्त्र: एक संक्षिप्त परिचय


रविकान्त पाण्डेय

वेद, जो कि सनातन माने गये हैं और जिनका भारतीय जनमानस पर गहरा प्रभाव है उनका ही एक अंग है छंद शास्त्र- "छंदः पादौ तु वेदस्य"। वैसे वेदों को समस्त विद्याओं का आदिस्रोत माना जाता है। यहां ये स्पष्ट कर देना उचित प्रतीत होता है कि कविता बिना छंदों के भी लिखी जा सकती है, लोग लिखते भी हैं, पर छंद रचना को आयु प्रदान करता है और "कवि" को "सुकवि" बनाने में सहायक होता है।

छंद की प्रेरणा कहां से मिली ?

मनुष्य की प्रेरणा का आदिस्रोत सदैव प्रकृति रही है। प्रक्रुति के साम्राज्य में चीजें एक निश्चित विधान के अनुसार घटित होती हैं- रात फ़िर दिन फ़िर रात, वसंत फ़िर ग्रीष्म फ़िर वर्षा आदि। प्रक्रुति के सान्निध्य में मनुष्य ने ब्रह्मांड में व्याप्त इस नियम को, इस क्रमिक व्यवस्था को पहचाना। और इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जब तमसा नदी के तट पर संसार का सबसे पहला काव्य सृजित हुआ तो उसका रचयिता जनमानस से दूर प्रकृति के ही सान्निध्य में रहनेवाला एक ऋषि था जिससे उसके ह्रुदय की संवेदना ने श्लोक कहलवा दिया-

मा निषाद प्रतिष्टां त्वमगमः शाश्वतीसमाः
यत्क्रौंच मिथुनात्मेकमवधीः काममोहितम

इस तरह से प्रारंभ हुआ संसार का सर्वप्रथम काव्य रामायण और वाल्मीकि आदिकवि हुये।

छंद शास्त्र के आचार्य

इस संबंध में संस्कृत में काफ़ी काम हुआ है और इस सिलसिले में सबसे पहला नाम आचार्य पिंगल का आता है। इनकी पुस्तक "छंदःसूत्रम" को आज भी विषय की सर्वाधिक प्रामाणिक रचना होने का गौरव प्राप्त है। अन्य परवर्ती आचार्यों में नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत, ज्योतिषाचार्य वाराहमिहिर, अग्निपुराण, श्रुतबोध के रचयिता कालिदास, सुवृत्ततिलक के रचयिता आचार्य क्षेमेंद्र, छंदोsनुशासन के रचयिता हेमचंद्र, वृत्तरत्नाकर के रचयिता केदारभट्ट, छंदोमंजरी के रचयिता गंगादास तथा वाणीभूषण के रचयिता दामोदर आदि का नाम मुख्य रूप से उल्लेखनीय है जिन्होनें अपनी इन पुस्तकों में इस विधा पर प्रकाश डाला है। हिंदी की प्रमुख पुस्तकों में भूषण चंद्रिका, छंदोऽर्णव एवं छंद प्रभाकर आदि का नाम लिया जा सकता है।

छंदों के प्रकार

प्रयोग के हिसाब से छंदों के दो भेद हैं- वैदिक और लौकिक। वैदिक छंद सात हैं- गायत्री, उष्णिक, अनुष्टुप, वृहती, पंक्ति, त्रिष्टुप और जगती। लैकिक छंद कई हैं जैसे- मंदाक्रांता, घनाक्षरी, दोहा, चौपाई आदि। अब छंदों की नियम व्यवस्था पर आते हैं। इस हिसाब से मोटे तौर पर दो विभाजन हैं (कुछ विद्वान तीन भी मानते है, विस्तार भय से इस पर फ़िलहाल चर्चा नहीं करेंगे)- मात्रिक छंद और वार्णिक छंद। मात्रिक में सिर्फ़ मात्राओं का बंधन होता है साथ ही कहीं कहीं पर लगु, गुरु का क्रम होता है जबकि वार्णिक वृत्तों में वर्णों का एक विशिष्ट क्रम होता है। आगे इस संबंध में विस्तार से चर्चा की जायेगी। एक छंद में सामान्यतया चार पाद होते हैं और अगर इन चारों पादों में समान योजना हो तो इन्हे सम, सम और विषम पादों में एक सी योजना हो तो अर्द्धसम और सभी पादों में अलग योजना हो तो इन्हे विषम कहा जाता है। नीचे के चित्र में देखें-

नोट: विस्तारभय से कई बातें छोड़ दी गई हैं एवं जनसामान्य को छंदों से परिचय कराने के उद्देश्य से यह संक्षिप्त जानकारी उपलब्ध कराई गई है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ेंगे, विषय विस्तार पाता जायेगा।
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छंद: कुछ और बातें

अब तक आपके सम्मुख स्पष्ट हो चुका होगा कि जब रचना में मात्रा, वर्ण, यति, गति आदि का ध्यान रखा जाये तो रचना छंदबद्ध कहलायेगी जिसे पद्य कहते हैं। जो बिना छंद के हो तो गद्य और जहां दोनों हों वहां चंपू समझना चाहिये।

आइये अब गणित की तरफ़ बढ़ते हैं-

गुरुलघु वर्णों की पहचान

छंद सीखने वालों को सर्वप्रथम गुरुलघु विचार पर ध्यान देना चाहिये। इस संबंध में निम्न बातें ध्यातव्य हैं-

१. ह्रस्व अक्षर को लघु माना जाता है। इसे "।" चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरण- अ, इ, उ, र, रि, तु आदि लघु हैं।

२. अर्द्धचंद्रबिंदु वाले वर्ण भी लघु माने जाते हैं जैसे "हँसी" में हँ" लघु है।

३. दीर्घ अक्षर को गुरु कहते है। इसे "ऽ" चिन्ह से प्रदर्शित किया जाता है। उदाहरण- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, रा, रे, री आदि।

४. संयुक्ताक्षर के पूर्व के लघु को दीर्घ माना जाता है। उदाहरण- सत्य, धर्म इनमें स और ध को गुरु माना जायेगा।

५. कभी-कभी संयुक्ताक्षर के पूर्व के लघु पर उच्चारणकाल में भार नहीं पडता। ऐसी स्थिति में उन्हे लघु ही माना जाता है। उदाहरण- तुम्हें, यहां तु लघु है।

६. कभी-कभी चरणांत के लघु को गुरु मान लिया जाता है। पढ़ते वक्त इसे दीर्घवत पढ़ा जाता है।

मात्रा और उसकी गणना

वर्णों के उच्चारण में लगनेवाले समय को मात्रा कहते हैं। इस हिसाब से अर्द्धमात्रा, एकमात्रा, द्विमात्रा और त्रिमात्रा का विधान है जो इस प्रकार हैं-

एक मात्रो भवेद ह्रस्वः द्विमात्रो दीर्घ उच्यते
त्रिमात्रस्तु प्लुतो ज्ञेयो व्यंजनंचार्द्ध मात्रकम

अर्थात ह्रस्व की एक मात्रा, दीर्घ की दो मात्रा, प्लुत की तीन और व्यंजन की आधी मात्रा मानी जाती है। पूर्व में हम कह आये हैं कि मनुष्य मूलतः प्रकृति से प्रेरणा लेता है अतः यहां बताना उचित होगा कि इन मात्राओं के प्राकृतिक उदाहरण क्या हैं-

चाषश्चैकांवदेन्मात्रां द्विमात्रं वायसो वदेत
त्रिमात्रंतु शिखी ब्रूते नकुलश्चार्द्धमात्रकम

अर्थात नीलकंठ की बोली एकमात्रा, कौआ दो मात्रा, मोर तीन मात्रा और नेवला आधीमात्रा वाला होता है। इनमें से छंदशास्त्र में सिर्फ़ एक और दो मात्राओं का ही प्रयोग होता है जो कि क्रमशः लगु और गुरु के लिये निर्धारित है।



गण विधान

तीन वर्णों को मिलाकर एक वर्णिक गण बनता है जिनकी कुल संख्या आठ है। इसे निम्न रूप में याद रखें-

यमाताराजभानसलगा:

१. यमाता = यगण = ।ऽऽ
२. मातारा = मगण = ऽऽऽ
३. ताराज = तगण = ऽऽ।
४. राजभा = रगण = ऽ।ऽ
५. जभान = जगण = ।ऽ।
६. भानस = भगण = ऽ॥
७. नसल = नगण = ॥।
८. सलगाः = सगण = ॥ऽ

इन आधारभूत नियमों को आत्मसात कर लेने पर आगे की राह आपके लिये आसान हो जायेगी।
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दोहा और उसका छंद विधान

परिचय: हममे से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने दोहे का नाम न सुना होगा। लोक में कबीर, तुलसी आदि के कतिपय दोहे मुहावरों की तरह प्रचलित हैं-

अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम
दास मलूका कहि गये सबके दाता राम

आछे दिन पाछे गयो हरि सों रखा न हेत
अब पछताये होत क्या चिड़िया चुग गइ खेत

सतसइया के दोहरे अरु नावक के तीर
देखन में छोटन लगें घाव करें गंभीर

आवत ही जो हर्ष नहिं नैनन नहीं सनेह
तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेंह

दोहे इस तरह हमारे जीवन में प्रविष्ट हो चुके हैं कि सुख-दुख, दर्शन, उपदेश आदि कोई भी क्षेत्र इनसे अछूता नहीं है। वास्तव में दोहा साहित्य की प्राचीन तथापि संपन्न विधा है।

दोहे का छंद शास्त्र

दोहा मात्रिक अर्द्धसम छंद है। अर्द्धसम की परिभाषा के मुताबिक इसके समचरणों में एक योजना तथा विषम चरणों में अन्य पदयोजना पाई जायेगी। विष चरण यानि पहले और तीसरे चरण में १३ मात्रायें एवं सम चरण यानि दूसरे तथा चौथे चरण में ११ मात्रायें रहेंगी।

विषम चरणों की बनावट: आदि में जगण न हो।

बनावट दो तरह की प्रचलित है- पहली- ३+३+२+३+२ = १३ (यहां चौथे त्रिकल में ।ऽ वर्जित है)
जैसे- राम नाम सुमिरा करो (सही)
राम नाम लो सदा तुम (गलत)

दूसरा प्रकार यूं है- ४+४+३+२ = १३ (यहां भी त्रिकल ।ऽ के रूप में नहीं आ सकता)

सम चरणों की बनावट: पहला प्रकार, ३+३+२+३ = ११
दोसरा प्रकार, ४+४+३ = ११ दोनों ही स्थितियों में अंत का त्रिकल हमेंशा ऽ। के रूप में आयेगा।

उपर्युक्त नियमों पर यदि सूक्ष्म दृष्टि दौड़ायें तो आप पायेंगे कि यहां सम के पीछे सम (४+४) और विषम के पीछे विषम (३+३) यानि एक ही चीज को दुहराया गया है इसी कारण इसे दोहा या दोहरा के नाम से जाना जाता है। साथ ही आप पायेंगे कि विषम चरणों के अंत में सगण, रगण अथवा नगण आयेगा और सम चरणों के अंत में जगण या तगण आयेगा।

विशेष: विषम चरण के प्रारंभ में जगण का निषेध सिर्फ़ नरकाव्य के लिये है। देवकाव्य या मंगलवाची शब्द होने की स्थिति में कोई दोष नहीं है। साथ ही जगण एक शब्द के तीन वर्णों में नहीं आना चाहिये, यदि दो शब्दों से मिलकर जगण बने तो वहां दोष नहीं है जैसे- " महान" एक शब्द के तीन वर्ण जगण बना रहे हैं अतः वर्जित है। जहां जहां = जहांज हां (जगण दो शब्दों से बन रहा है अतः दोष नहीं है।)
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दोहों में विषम पद के बारे में कुछ अन्य उदाहरण

कबीर यहु घर प्रेम का
जाति न पूछो साधु की
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वर्तमान / सामयिक संदर्भों में आप जैसे नौजवान की छंदों में अभिरुचि काफी प्रभावित करती है| आभार रविकान्त पाण्डेय जी|
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पहली समस्या पूर्ति - चौपाई - मयंक अवस्थी जी [६] और रवि कांत पाण्डेजी [७]

सम्माननीय साहित्य रसिको

पहली समस्या पूर्ति 'चौपाई' के अगले पड़ाव में इस बार दो रचनाधर्मियों को पढ़ते हैं|


भाई श्री मयंक अवस्थी जी:-

श्री मयंक अवस्थी जी रिजर्व बॅंक, नागपुर में कार्यरत हैं| शे'रो शायरी का बहुत ही जबरदस्त ज्ञान है आपको| और अब देखिए उन की अनुभवी लेखनी ने चौपाइयों के माध्यम से क्या जलवे बिखेरे हैं:-

निर्निमेष तुमको निहारती|
विरह –निशा तुमको पुकारती|
मेरी प्रणय –कथा है कोरी|
तुम चन्दा, मैं एक चकोरी|१|

खत भी तुमको भिजवाया पर|
शलभ, वर्तिका तक आया पर|
कब सुनते हो शून्य कथायें|
महाअशन में ये समिधायें|२|

तुम बादल मैं प्यासी धरती|
तुम बिन मैं सिँगार क्या करती|
बन जाते माथे पर कुमकुम|
कितने अच्छे लगते हो तुम|३|
शलभ=पतंगा, वर्तिका=शम्मा, महाअशन=यज्ञ की विकराल अग्नि



भाई श्री रविकान्त पाण्डे जी:-

भाई रवि कांत पाण्डे जी हम से पहली बार जुड़े हैं| उन के बारे में मुझे विशेष जानकारी नहीं है, परंतु उनकी लेखनी स्वयँ ही उनका परिचय दे रही है:-

मौसम के हाथों दुत्कारे|पतझड़ के कष्टों के मारे|सुमन हृदय के जब मुरझाये|
तुम वसंत बनकर प्रिय आये|१|


नूतन किसलय तुमसे पाकर|
जीर्ण-शीर्ण सब पात हटाकर|

मस्ती में होकर मतवाली|

झूम रही उपवन की डाली|२|


लोग कहें घर दूर तुम्हारा|

किंतु नहीं मैने स्वीकारा|

दिल में मेरे बसते हो तुम|

कितने अच्छे लगते हो तुम|३|


भाई श्री मयंक जी और भाई श्री रवि कांत जी को बहुत बहुत बधाई इतने सुंदर्र और स-रस चौपाइयों को पढ़ने का सु-अवसर प्रदान करने के लिए|

इस आयोजन को गति प्रदान करने हेतु सभी साहित्य सेवियों से सविनय निवेदन है कि अपना अपना यथोचित योगदान अवश्य प्रदान करें| अपनी रचनाएँ navincchaturvedi@gmail.com पर भेजने की कृपा करें|

पहले समस्या पूर्ति के बार में और अधिक जानकारी के लिए यहाँ क्लिक करें:- समस्या पूर्ति: पहली समस्या पूर्ति - चौपाई