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बिहारी के दोहे

नहिं पराग नहिं मधुर मधु नहिं विकास इहि काल।
अली कली में ही बिंध्यो आगे कौन हवाल।।

चिरजीवौ जोरी जुरै, क्यों न सनेह गँभीर।
को घटि ये वृषभानुजा, वे हलधर के बीर॥

कोटि जतन कोऊ करै, परै न प्रकृतिहिं बीच।
नल बल जल ऊँचो चढ़ै, तऊ नीच को नीच।।