बड़ी सयानी है यार क़िस्मत सभी की बज़्में सजा रही है
कहीं पे जलवे दिखा रही है कहीं जुनूँ आज़मा रही है
अगर तू बस दास्तान में है अगर नहीं कोई रूप तेरा
तो फिर फ़लक से ज़मीं तलक ये धनक हमें क्या दिखा रही है
सभी दिलो-जाँ से जिस को चाहें उसे भला आरज़ू है किस की
ये किस से मिलने की जुस्तजू में हवा बगूले बना रही है
तमाम दुनिया तमाम रिश्ते हमाम की दास्तान जैसे
हयात की तिश्नगी तो देखो नदी किनारों को खा रही है
चलो कि इतनी तो है ग़नीमत कि सब ने इस बात को तो माना
कोई कला तो है इस ख़ला में जो हर बला से बचा रही है
:- नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे रजज़ मख़बून मरफ़ू’ मुख़ल्ला
मुफ़ाइलुन फ़ाएलुन फ़ऊलुन मुफ़ाइलुन फ़ाएलुन फ़ऊलुन
1212 212 122 1212 212 122