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उस का ख़याल आते ही मञ्ज़र बदल गया - रऊफ़ रज़ा

उस का ख़याल आते ही मञ्ज़र बदल गया
मतला सुना रहा था कि मक़्ता फिसल गया
मञ्ज़र - दृश्य

 बाजी लगी हुयी थी उरूजो-ज़वाल की
मैं आसमाँ-मिज़ाज ज़मीं पर मचल गया
उरूजो-ज़वाल = चढ़ाव-उतार

चारों तरफ़ उदास सफ़ेदी बिखर गयी
वो आदमी तो शह्र का मञ्ज़र बदल गया 

तुम ने जमालियात बहुत देर से पढ़ी
पत्थर से दिल लगाने का मौक़ा निकल गया 
जमालियात - सौदर्य सम्बन्धित

सारा मिज़ाज नूर था सारा ख़याल नूर
और इस के बावजूद शरारे उगल गया

: रऊफ़ रज़ा
9811326547

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212

राहों की धूल फाँकी है बरसात भी सही - नवीन

राहों की धूल फाँकी है बरसात भी सही।
हम इस के बावुजूद हैं नक़्शानवीस ही॥

टपके नहीं फ़लक से ग़रीबों के अस्पताल।
अक्सर इन्हें बनाता है कोई रईस ही॥

पैदल चलें, उड़ें कि तसव्वुर के डग भरें।
आख़िर तो सब के हाथ में लगनी है टीस ही॥

क़दमों में तीरगी है बदन भर में चन्द्रमा।
क़िस्मत में राख लिक्खी है तो राख ही सही॥

इस आज को तबाह न कर बह्स में ‘नवीन’।
कल ही पता चलेगा समझ किस की थी सही॥

नक़्शानवीस - नक़्शा बनाने वाला, तसव्वुर – कल्पना, तीरगी - अँधेरा


:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212

अपनी खुसी सूँ थोरें ई सब नें करी सही - नवीन

अपनी खुसी सूँ थोरें ई सब नें करी सही
बौहरे नें दाब-दूब कें करबा लई सही

जै सोच कें ई सबनें उमर भर दई सही
समझे कि अब की बार की है आखरी सही

पहली सही नें लूट लयो सगरौ चैन-चान
अब और का हरैगी मरी दूसरी सही

मन कह रह्यौ है बौहरे की बहियन कूँ फार दऊँ
फिर देखूँ काँ सों लाउतै पुरखान की सही

धौंताए सूँ नहर पे खड़ो है मुनीम साब
रुक्का पे लेयगौ मेरी सायद नई सही

म्हाँ- म्हाँ जमीन आग उगल रइ ए आज तक
घर-घर परी ही बन कें जहाँ बीजरी सही

तो कूँ भी जो ‘नवीन’ पसंद आबै मेरी बात
तौ कर गजल पे अपने सगे-गाम की सही

सही = दस्तख़त, सगरौ – सारा, कुल, हरैगी – हर लेगी, छीनेगी, मरी = ब्रजभाषा की एक प्यार भरी गाली, बहियन = बही का बहुवचन, लाउतै = लाता है, धौंताए सूँ = अलस्सुबह से, बीजरी = बिजली,

[ब्रजभाषा – ग्रामीण]


भावार्थ ग़ज़ल 
[मानकों के अधिकतम निकट रहते हुये]

अपनी ख़ुशी से तो न किसी ने भी की सही
बौहरे के दबदबे ने ही करवा ली थी सही

बस ये ही सब ने सोच के ताउम्र की सही
शायद हो अब की बार की ये आख़िरी सही

पहली सही ही लूट चुकी थी सुकूनोचैन
अब और क्या करेगी मुई दूसरी सही

मन कह रहा है बौहरे की बहियों को फाड़ दूँ
देखूँ कहाँ से लाता है अजदाद की सही

अल सुब्ह से मुनीम जी बैठे हैं नह्र पर
रुक्के पे लेनी है मेरी शायद नयी सही

वाँ-वाँ ज़मीन आग उगलती है आज तक
घर-घर गिरी थी बन के जहाँ बीजरी सही

तुमको भी जो ‘नवीन’ पसन्द आये मेरी बात
कीजे ग़ज़ल पे अपने सगे-गाँव की सही

———–

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
 221 2121 1221 212

दिल चीज़ क्या है चाहिये तो जान लीजिये - मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी [1751-1824]

दिल चीज़ क्या है चाहिये तो जान लीजिये
पर बात को भी मेरी ज़रा मान लीजिये

मरिये तड़प-तड़प के दिला क्या ज़ुरुर है
सरपर किसी की तेग़ का एहसान लीजिये
दिला – ऐ दिल, तेग़ – तलवार

आता है जी में चादरे-अब्रे-बहार को
ऐसी हवा में सर पे ज़रा तान लीजिये
चादरे-अब्रे-बहार – बहार रूपी बादल की चादर

मैं भी तो दोस्त दार तुम्हारा हूँ मेरी जाँ
मेरे भी हाथ से तो कभू पान लीजिये
 कभू – कभी कभार

कीजे शरीक हम को दिला भी, रवा नहीं –
यूँ आप ही आप लज़्ज़्ते-पैकान लीजिये
रवा – उचित, लज़्ज़्ते-पैकान – तीर का मज़ा, यहाँ आप ही आप को आपीआप की तरह पढ़ा जाना है

इस अपनी तंग चोली पे टुक रह्म कीजे जान
ख़म्याज़ा इस तरह से न हर आन लीजिये

गर क़ब्रे-कुश्तगाँ पे तुम आये हो तो मियाँ
अपने शहीदेनाज़ को पहिचान लीजिये
क़ब्रे-कुश्तगाँ – शहीदों की क़ब्र

बोसे का जो तुम्हारे गुनहगार हो मियाँ
लाज़िम है उस से बोसा ही तावान लीजिये
तावान – दण्ड स्वरूप

मुश्किल नहीं है यार कि फिर मिलना ‘मुसहफ़ी’
मरने की अपने जी में अगर ठान लीजिये

:- मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

[1751-1824]

यह पोस्ट मेरे लिये महज़ एक पोस्ट न हो कर पूर्वजों के चरणों में एक श्रद्धा सुमन की तरह है। उस्ताज़ मुहतरम तुफ़ैल चतुर्वेदी साहब से मालूम हुआ कि हमारे [शायराना] ख़ानदान का शजरा [वंश-वृक्ष] तुफ़ैल साहब से ज़नाबे कृष्ण बिहारी 'नूर' साहब से ज़नाबे फ़ज़ल अब्बास नक़वी साहब ..... वग़ैरह वग़ैरह से होते हुये ज़नाबे मुसहफ़ी तक जाता है। मुसहफ़ी साहब ख़ुदा-ए-सुख़न मीर तक़ी मीर साहब के समकालीन थे। उपरोक्त ग़ज़ल उन की चर्चित ग़ज़लों में से एक है। इसी से मिलता जुलता मिसरा हम लोगों ने बहुत गुनगुनाया है 'दिल चीज़ क्या है आप मेरी जान लीजिये। बस एक बार मेरा कहा मान लीजिये॥ 


बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाएलातु  मुफ़ाईलु फ़ाएलुन
 221 2121 1221 212 

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगोशियाँ - नवीन

जल को ज़मीं, ज़मीन को सरगोशियाँ मिलीं। 
तब जा के इस दयार को ख़ुशफ़हमियाँ मिलीं।। 

सूरज ने चन्द्रमा को उजालों से भर दिया। 
हासिल ये है कि रात को परछाइयाँ मिलीं।। 

अब्रों ने ज़र्रे-ज़र्रे को अच्छे से धो दिया। 
बाद उस के आसमान को बीनाइयाँ मिलीं।। 

दैरो-हरम हों या कि बयाबाँ, हरिक जगह। 
शेखी बघारती हुई अय्याशियाँ मिलीं।। 
 
उड़ते हुये परिन्द - हमारी 'व्यथा' न पूछ। 
दरकार शाहराह थी - पगडण्डियाँ मिलीं।। 

क़िस्मत को ये मिला तो मशक़्क़त को वो मिला। 
इस को मिला ख़ज़ाना उसे चाभियाँ मिलीं।। 

जब-जब किया है वक़्त से हमने मुक़ाबला। 
उस को बुलन्दियाँ हमें गहराइयाँ मिलीं।। 

रहमत का राग अपनी जगह ठीक है मगर। 
जिसने पसारा हाथ उसे रोटियाँ मिलीं।। 

कितने ही नौज़वान ज़मींदोज़ हो गये। 
वो तन हैं ख़ुशनसीब जिसे झुर्रियाँ मिलीं।। 

हमने दिलेफ़क़ीर टटोला तो क्या बताएँ। 
ख़ामोशियों से तंग परेशानियाँ मिलीं।। 

तुम को बता रहा हूँ किसी को बताना मत। 
ख़ुद को किया ख़राब तभी मस्तियाँ मिलीं।। 

सौ-फ़ीसदी मिठास किसी में नहीं 'नवीन'। 
जितनी ज़बाँ हैं सब में कई गालियाँ मिलीं।। 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन 
221 2121 1221 212 

नफ़रत बढ़ा रहे हैं मुसलसल रिवाज़-ओ-रस्म - नवीन

आधी उड़ान छोड़ के जो लौट आये थे
जन्नत के ख़्वाब हम को उन्हीं ने दिखाये थे

अम्नोसुक़ून शह्र की तक़दीर में कहाँ
इस ही जगह परिन्द कभी छटपटाये थे

कुछ देर ही निगाह मिलाते हैं लोग-बाग
दो चार बार हमने भी आँसू बहाये थे

नफ़रत बढ़ा रहे हैं मुसलसल रिवाज़-ओ-रस्म
बेकार हमने रेत में दरिया बहाये थे

हीरे-जवाहरात की महफ़िल का हो गुमान
चुन-चुन के लफ़्ज़ उस ने यूँ मिसरे सजाये थे

किरदार भी बनाती है ज़िल्लत कभी-कभी
तुलसी व कालिदास इसी ने बनाये थे

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ
मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन.

221 2121 1221 212.

दिन इक के बाद एक गुजरते हुये भी देख - मुहम्मद अल्वी

दिन इक के बाद एक गुजरते हुये भी देख
इक दिन तू अपने आप को मरते हुये भी देख

हर वक़्त खिलते फूल की जानिब तका न कर
मुरझा के पत्तियों को बिखरते हुये भी देख

हाँ देख बर्फ़ गिरती हुई बाल-बाल पर
तपते हुये ख़याल ठिठुरते हुये भी देख

अपनों में रह के किस लिये सहमा हुआ है तू
आ मुझको दुश्मनों से न डरते हुये भी देख

पैवंद बादलों के लगे देख जा-ब-जा
बगलों से आसमान कतरते हुये भी देख

हैरान मत हो तैरती मछली को देख कर
पानी में रौशनी को उतरते हुये भी देख

उस को ख़बर नहीं है अभी अपने हुस्न की
आईना दे के बनते सँवरते हुये भी देख

देखा न होगा तूने मगर इंतिज़ार में
चलते हुये समय को ठहरते हुये भी देख

तारीफ़ सुन के दोस्त से 'अल्वी' तू ख़ुश न हो
उस को तेरी बुराइयाँ करते हुये भी देख
:- मुहम्मद अल्वी

मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन
221 2121 1221 212
बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख - शकेब जलाली

मुरझा के काली झील में गिरते हुए भी देख
सूरज हूँ मेरा रंग मगर दिन ढले भी देख.

हरचन्द राख़ हो के बिखरना है राह में
जलते हुये परों से उड़ा हूँ मुझे भी देख
हरचन्द - हालाँकि

आलम में जिस की धूम थी उस शाहकार पर
दीमक ने जो लिखे वो कभी तब्सिरे भी देख

कागज़ की कतरनों को भी कहते हैं लोग फूल
रंगों का एतबार ही क्या सूँघ के भी देख.

तूने कहा न था कि मैं कश्ती पे बोझ हूँ
आँखों को अब न ढाँप मुझे डूबते भी देख.

बिछती थीं जिस की राह में फूलों की चादरें
अब उस की ख़ाक घास के पैरों तले भी देख

इन्सान नाचता है यहाँ पुतलियों के रंग
दुनिया में आ गया है तो इसके मज़े भी देख.

क्या शाख़ेबासमर है? जो ताकता है फ़र्श को!!!
नज़रें उठा 'शकेब' - ज़रा सामने भी देख


मफ़ऊलु फाएलातु मुफ़ाईलु फाएलुन
221 2121 1221 212
बहरे मुजारे मुसमन अखरब मकफूफ़ महजूफ


शकेब साहब की इस ग़ज़ल को अलग अलग जगहों पर अलग अलग रूप में पढ़ा, इस लिये सब को इकट्ठा करते हुये पोस्ट किया है