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फ़लक है सुर्ख़ मगर आफ़ताब काला है - मयंक अवस्थी



फ़लक है सुर्ख़ मगर आफ़ताब काला है

अन्धेरा है कि मिरे शहर में उजाला है

 

चमन मे आज भी किरदार दो ही मिलते हैं

है एक साँप,तो इक साँप का निवाला है

 

शबे-सफ़र तो इसी आस पर बितानी है

अजल के मोड़ के आगे बहुत उजाला है.

 

जहाँ ख़ुलूस ने खायी शिकस्त दुनिया से

वहीं जुनून ने उठ कर मुझे सम्भाला है

 

उसे यकीन है दरिया पलट के आयेगा

किनारे बैठ के कंकर जभी उछाला है

 

वो डस रहा है ये शिकवा करें तो किससे करें

हमीं ने साँप अगर आस्तीं में पाला है

 

वही ज़ुबान पे लिपटा है और वही दिल पे

किसी का नाम मिरी ज़िन्दगी पे छाला है

 

मै उस जुनून की सरहद पे हूँ जहाँ शायद

वो फिर से तूर का जलवा दिखाने वाला है

 

अज़ल अबद की हदो में सिमट गया हूँ मैं

मेरे मकान के दोनों दरों पे ताला है

 

मैं खो गया हूँ तेरे ख़्वाब के तअक्कुब में

बस एक जिस्म मेरा आख़िरी हवाला है

 

 

मयंक अवस्थी 08765213905

 

 

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ

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हवा का हाथ परों से जो मैं बँटाता हूँ- नवीन

हवा का हाथ परों से जो मैं बँटाता हूँ।
ये मुझ प फ़र्ज़ है साहब मैं इक परिन्दा हूँ॥
मेरा वुजूद है मौजूद हर जगह लेकिन।
मैं ख़ुश्बुओं में ठहरना पसन्द करता हूँ॥
मेरी उदास नज़र को न कोसिये साहब।
मैं बारिशों में तरसता हुआ पपीहा हूँ॥
करोड़ों साल भले उम्र हो चुकी है मगर।
मेरी नज़र में तो मैं अब भी एक बच्चा हूँ॥
जिसे पढा था किसी वालमीकि ने इक रोज़।
दरूने-वस्ल का हाँ मैं वही बिछड़ना हूँ॥
इक अपना जिस्म छुपाने की बदहवासी में।
ज़माने भर की तमन्नाएँ ओढ लेता हूँ॥
अज़ीब शौक़ हैं मेरे अज़ीब अफ़साने।
समुन्दरों को जला कर बुझा भी देता हूँ॥
हो जिसके पास जवाब उस से बात क्या करना।
मैं ख़ुद जवाब से उलटे सवाल करता हूँ॥
'नवीन' सम्त सफ़र हो तो मैं भी हूँ तैयार।
उसी पुराने सफ़र से तो कल ही लौटा हूँ॥



नवीन सी• चतुर्वेदी

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किसी की याद के सावन जब आहें भरते हैं - नवीन

किसी की याद के सावन जब आहें भरते हैं।
हम आँसुओं के हिंडोलों में ऐश करते हैं॥
हवा सिसकती है अब्रों की ओट में छुप कर।
तुम्हारे लम्स का जब उस से ज़िक्र करते हैं॥
जो देखते हैं उन्हें भी बहा के ले जाएँ।
ग़मों के दरिया इस अन्दाज़ से उतरते हैं॥
मुहब्बतों का हुनर सब के बस की बात नहीं।
फिसलनी सत्ह पे कम ही क़दम ठहरते हैं॥
डगर-डगर पे नगर की बशर-बशर है उदास।
गुहर बिखरने लगें तो बहुत बिखरते हैं॥
हिंडोला – एक तरह का झूला, अब्र – बादल, लम्स – स्पर्श, बशर – मनुष्य, गुहर – मोती

नवीन सी. चतुर्वेदी
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अब इस से बढ के भला क्या कमाल होना है - नवीन

अब इस से बढ के भला क्या कमाल होना है
हमें ही अगली सदी का सवाल होना है
हम उस पतंगे की मानिन्द ही तो हैं जिस का
विसाल होते ही बस इन्तक़ाल होना है
हम इस जहान के सबसे बड़े नजूमी हैं
हमें पता है हमेँ कब हलाल होना है
सब अपने-अपने क़बीलों को इत्तला कर दो
सभी को सब के लिये इस्तेमाल होना है
तरक़्क़ियों को तलाशा तो ये समझ आया
हमें ग़रीब उन्हें मालामाल होना है
ये वो गुलिस्ताँ नहीं है सभी को है मालूम
मगर तमाशा अभी डाल-डाल होना है
चलो यहाँ से रिहाई का इन्तज़ाम करें
यहाँ तो रोज़ नया एक वबाल होना है
कमाल ही तो कहा जायेगा ‘नवीन’ तुम्हें
मिसाल बख़्शे बिना बे-मिसाल होना है
नवीन सी चतुर्वेदी

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बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन - नवीन

बुझे हैं ऐसे कि हो कर भी नईं हुए रौशन
न जाने किस के हुनर से चराग़ थे रौशन
जो उस का काम है उस ने वही किया साहब
बुझे हुओं को जला कर बुझा-दिये……. रौशन
शबे-विसाल तो आँखों पे ख़्वाब हावी थे
शबे-फ़िराक़ भी दीदे न हो सके रौशन
किसी के दिल में जो सपने थे, इक इशारे पर
हमारी पलकों से झर-झर के हो गये रौशन
दुआएँ ऐसे ही दी जाती हैं मुहब्बत में
उदासियों का ठिकाना सदा रहे रौशन
हम उस असर के बशर हैं जिसे सितमगर ने
इनायतों में नवाज़े अनासिरे-रौशन
कुछ ऐसे झूल रहे हो ‘नवीन’ तुम जैसे
तुम्हारे शानों पे रक्खे हों क़ाफ़िये रौशन
नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
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भटक न जाये कहीं और ये दिले-रौशन - नवीन

भटक न जाये कहीं और ये दिले-रौशन
ज़रा इधर भी नज़र डाल मञ्ज़िले-रौशन
सियाह-शब में सफ़ीने कहाँ-कहाँ भटके
ये जानता ही कहाँ है वो साहिले-रौशन
उजास भरते हैं लम्हों में फ़ैसले इस के
तभी तो वक़्त को कहते हैं आदिले-रौशन
तमाम उम्र सियापों से क्यों उजाली जाय
जहाँ में और भी तो हैं मसाइले-रौशन
हमें नहीं तो किसी और को मिले मौक़ा
किसी के काम तो आये ये महफ़िले-रौशन
नवीन सी. चतुर्वेदी

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तमाम ज़ह्न हैं उन के जमाल से रौशन - नवीन

तमाम ज़ह्न हैं उन के जमाल से रौशन
धुनें जो फ़िल्म जगत को सुना गये रौशन
किसी धुनों के पुजारी से पूछिये साहब
ऋतिक बता न सकेंगे कि कौन थे रौशन
मुझे भी याद नहीं सब की सब धुनें उनकी
बस इतना याद है गीतों की शान थे रौशन
कई अदीबों को मौक़े दिये, निखारा भी
तभी तो कहते हैं दिल के भी थे बड़े रौशन
लता जी और मोहम्मद रफ़ी के जीवन के
सुनहरे-पन्नों की तहरीर ख़ुद रहे रौशन
बहुत अज़ीज़ रही यूँ तो उनको सारङ्गी
प बाँसुरी के सुरों से भी थे बँधे रौशन
भले ही कितना भी कहिये वो कम लगे है “नवीन”
कुछ ऐसे शख़्स थे हम सब के लाड़ले रौशन
नवीन सी चतुर्वेदी


बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
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हमारे बाप का हिन्दोसतान है साहब - नवीन

सितम की ज़द पर तमाम आसमान है साहब।
हरेक शख़्स की आफ़त में जान है साहब॥


वतन सभी का है लेकिन ज़रा सा अन्तर है।
किसी का घर है किसी का मकान है साहब॥ 



ये दौर वो है जहाँ कोई भी नहीं महफ़ूज़। 
यहाँ सभी की हथेली प जान है साहब॥ 



हमारे जैसा मधुर तुम न बोल पाओगे। 
तुम्हारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान है साहब॥  



हमारे वासते धरती है माँ, पिता आकाश। 
हमारे बाप का हिन्दोसतान है साहब॥ 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 



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क्षमानुराग सतत पा रहे क्षरण मित्रो - नवीन

क्षमानुराग सतत पा रहे क्षरण मित्रो
कहीं अनिष्ट न कर दें दुराचरण मित्रो

हमें बस एक दशानन-कथा स्मरण है बस
अनेक बार हुआ है सिया-हरण  मित्रो

समाज-शास्त्र अभिप्राय को तरसता है
कहीं बिगाड़ न दें हम समीकरण मित्रो

स-हर्ष नष्ट करे है विरोध के अवसर
नितान्त नेष्ट नहीं है वशीकरण मित्रो

भविष्य उज्ज्वलतम किस तरह बनायेगा

उदारवाद प्रवर्तित निजीकरण मित्रो

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 


बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
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3 ग़ज़लें - पवन कुमार

 तुम्हें पाने की धुन इस दिलको अक्सर यूँ सताती है
बँधी मुट्ठी में जैसे कोई तितली फड़फड़ाती है

चहक उठता है दिन और शाम नगमे गुनगुनाती है
तुम्हारे पास आता हूँ तो हर शय मुसकुराती है

मुझे ये ज़िन्दगी अपनी तरफ़ कुछ यूँ बुलाती है
किसी मेले में क़ुलफ़ी जैसे बच्चों को लुभाती है

वही बेरङ्ग सी सुब्हें, वही बे-क़ैफ़ सी शामें
मुझे तू मुस्तक़िल ऐ ज़िन्दगी क्यूँ आजमाती है

क़बीलों की रवायत, बन्दिशें, तफ़रीक़ नस्लों की
मुहब्बत इन झमेलों में पड़े तो हार जाती है

किसी मुश्किल में वो ताक़त कहाँ जो रासता रोके
मैं जब घर से निकलता हूँ तो माँ टीका लगाती है

न जाने किस तरह का क़र्ज़ वाजिब था बुज़ुर्गों पर
हमारी नस्ल जिस की आज तक क़िस्तें चुकाती है

हवाला दे के त्यौहारों का, रस्मों का, रवाज़ों का
अभी तक गाँव की मिट्टी इशारों से बुलाती है
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन
1222 1222 1222 1222


जहां हमेशा समंदर ने मेहरबानी की
उसी ज़मीन पे किल्लत है आज पानी की

उदास रात की चौखट पे मुंतज़िर आँखें
हमारे नाम मुहब्बत ने ये निशानी की

तुम्हारे शहर में किस तरह जिंदगी गुज़रे
यहाँ कमी है तबस्सुम की ,शादमानी की

ये भूल जाऊं तुम्हें सोच भी नहीं सकता
तुम्हारे साथ जुड़ी है कड़ी कहानी की

उसे बताये बिना उम्र भर रहे उसके
किसी ने ऐसे मुहब्बत की पासबानी की
बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन
1212 1122 1212 22


ज़रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं
सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं

पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में
बहुत बेबाक होते हैं तो रिश्ते टूट जाते हैं

दिखाते हैं नहीं जो मुद्दतों तिश्नालबी अपनी
सुबू के सामने आकर वो प्यासे टूट जाते हैं

किसी कमजोर की मज़बूत से चाहत यही देगी
कि मौजें सिर्फ़ छूती हैं ,किनारे टूट जाते हैं

यही इक आखिरी सच है जो हर रिश्ते पे चस्पा है
जरूरत के समय अक्सर भरोसे टूट जाते हैं

गुज़ारिश अब बुज़ुर्गों से यही करना मुनासिब है
ज़ियादा हो जो उम्मीदें तो बच्चे टूट जाते हैं
बहरे हज़ज मुसम्मन सालिम
मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

1222 1222 1222 1222

:- पवन कुमार
9412290079

फ़ुजूल चुलबुले जुमलों की ओर क्यों ले जाऊँ - नवीन


फ़ुजूल चुलबुले जुमलों की ओर क्यों ले जाऊँ
ग़ज़ल को सिर्फ़ लतीफ़ों की ओर क्यों ले जाऊँ

ग़ज़ल की रूह ज़मानों की प्यास ढोती है 
पराई प्यास पियालों की ओर क्यों ले जाऊँ

नहीं ये बात नहीं है कि भीड़ से है गुरेज़
मगर तलाश तमाशों की ओर क्यों ले जाऊँ 

न जी भरा है सफ़र से न ही थका है बदन
अभी से नाव किनारों की ओर क्यों ले जाऊँ

जिरह के मोड़ कई रासते सुझाते हैं
अभी से बह्स नतीज़ों की ओर क्यों ले जाऊँ

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 


बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ

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गुबार-ए-फ़िक्र को तहरीर करता रहता हूँ - सालिम शुजा अन्सारी


गुबार-ए-फ़िक्र को तहरीर करता रहता हूँ
मैं अपना दर्द हमागीर करता रहता हूँ

रिदा-ए-लफ़्ज़ चढ़ाता हूँ तुरबते-दिल पर
ग़ज़ल को ख़ाके-दरे-मीर करता रहता हूँ

नवर्द-आज़मा हो कर हयात से अपनी
हमेशा फ़त्ह की ताबीर करता रहता हूँ

न जाने कौन सा ख़ाका कमाले-फ़न ठहरे
हर इक ख़याल को तसवीर करता रहता हूँ

बदलता रहता हूँ गिरते हुए दरो-दीवार
मकाने-ख़स्ता में तामीर करता रहता हूँ

लहू रगों का मसाफ़त निचोड़ लेती है
मैं फिर भी ख़ुद को सफ़र-गीर करता रहता हूँ

उदास रहती हैं मुझ में सदाक़तें मेरी
मैं लब कुशाई में ताखीर करता रहता हूँ

सदाएँ देती हैं ‘सालिम’ बुलन्दियाँ लेकिन
ज़मीं को पाँव की ज़ंजीर करता रहता हूँ



तहरीर करना – लिखना, शब्दांकित करना, रिदा-ए-लफ़्ज़ – शब्दों
की चादर, तुरबत – क़ब्र, हयात – जीवन, ताबीर – कोशिश,
हमागीर – फैलाने के संदर्भ में, तामीर – निर्माण, मसाफ़त – यात्रा,
सफ़र-गीर, यात्रा में व्यस्त, लबकुशई, ताखीर,


सालिम शुजा अन्सारी
9837659083


बहरे मुजतस मुसमन मख़बून महज़ूफ
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