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बस्ती को आग की यह क़बा कौन दे गया - महेंद्र हुमा

बस्ती को आग की यह क़बा कौन दे गया। 
बुझती नहीं है आग हवा कौन दे गया॥ 

सब का सफेद ख़ून है यह तो बताइये। 
उन की हथेलियों को हिना कौन दे गया॥ 

इनसान की तलाश में बस्ती के लोग थे। 
इन बस्तियों को इतने ख़ुदा कौन दे गया॥ 

बेरोज़गारी, दर्द, घुटन टीस और कसक। 
इन सब को मेरे घर का पता कौन दे गया॥ 

:- महेन्द्र हुमा (मथुरा)
07669979637

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
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मैं एहतियाते-हुस्ने-ख़ला में लगा रहा - नवीन

मैं एहतियाते-हुस्ने-ख़ला में लगा रहा।
इनसान हूँ सो कारे-वफ़ा में लगा रहा॥
ये काम करना सब से ज़ुरूरी था इसलिये।
मैं लमहा-लमहा फ़िक्रे-फ़ज़ा में लगा रहा॥
ख़ामोशियों से डर के तमाम उम्र साहिबान।
मैं कारोबारे-सिन्फ़े-नवा में लगा रहा॥

नवीन सी चतुर्वेदी


बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
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कहिये नवीन आप के तेवर कहाँ गये - नवीन

कहिये नवीन आप के तेवर कहाँ गये।
क़तरे ही दिख रहे हैं - समुन्दर कहाँ गये॥

अब तो हरिक निगाह यही पूछती है बस।
वे पल जो कल तलक थे मयस्सर
 - कहाँ गये॥

साहिल पे सर पटक के कोई चीखता है रोज़।
मुझ को हराने वाले शनावर कहाँ गये॥

रस्मोरवाज़, इल्म, शराफ़त, मुहब्बतें।
जिनसे है ये जहान वे आज़र कहाँ गये॥

मुमकिन है कल  ख़याल उठा दें न ये सवाल।
सर करते थे जो हम को वे लश्कर कहाँ गये॥

नफ़रत के पासबान तुम्हें क्या बतायें हम।
उलफ़त के पासबान कबूतर कहाँ गये॥

हम तो यहीं  खड़े हैं मगर आप ऐ 'नवीन'।
बुझते हुये दियों को जला कर कहाँ गये॥

मयस्सर - हासिल, उपलब्ध; शनावर - तैराक; आज़र - शिल्पी, किसी वास्तु-शिल्प आदि को बनाने-सजाने वाले
नवीन सी चतुर्वेदी

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अब जैसे भी हुई हो भलाई हुई तो है - नवीन

अब जैसे भी हुई हो भलाई हुई तो है
नाकामियों ने राह दिखाई हुई तो है
मौक़ा नहीं मिला है ये किस तर्ह बोल दें
बन्जर ज़मीन हिस्से में आई हुई तो है
इस बार बात बनने के इमकान1 हैं बहुत
ग़म के सिवा ख़लिश भी सवाई हुई तो है
यूँ ही तुम्हारे शेरों का चरबा2 नहीं हुआ
तुम ने ग़ज़ल किसी को सुनाई हुई तो है
दाबे नहीं दबे है दरप3 इस मकान का
होने को कुल बदन की तराई हुई तो है
देखें घड़ी लगन की निकलती है किस घड़ी
परमातमा के संग सगाई हुई तो है
आख़िर दरस दिखाने में इतना गुरेज़ क्यों
धूनी हम आइनों ने रमाई हुई तो है
उन की ग़रज़ नहीं तो हमारी ग़रज़ सही
उन के हुज़ूर अपनी रसाई4 हुई तो है
वादाख़िलाफ़ कैसे हुए हम बताइये
अश्कों ने पाई-पाई चुकाई हुई तो है
देखें इबादतों के चमन बख़्शते हैं क्या
वहदानियत5 की पौध लगाई हुई तो है
ये और बात है कि सुनाई नहीं पड़ी
ब्रज की गजल ने टेर लगाई हुई तो है
अब और कितने वृक्ष कटाओगे ऐ ‘नवीन’
तुम ने जगत की कूत6 कुताई7 हुई तो है
****
1 सम्भावनाएँ 2 नकल 3 गरमी, दर्प, अहंकार 4 पहुँच 5 अद्वैतवाद, एकोहम् द्वितीयो नास्ति, हर धर्म-ग्रन्थ के ईश्वर का बयान 6 मूल्यांकन 7 (मूल्यांकन) करना
नवीन सी. चतुर्वेदी
बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब
मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
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पहले तो हम को पंख हवा ने लगा दिये - नवीन

पहले तो हम को पंख हवा ने लगा दिये । 
और फिर हमारे पीछे फ़साने लगा दिये ॥ 

तारे बेचारे ख़ुद भी सहर के हैं मुन्तज़िर । 
सूरज ने उगते-उगते ज़माने लगा दिये ॥ 

हँसते हुए लबों पै उदासी उँडेल दी । 
शादी में किसने हिज़्र के गाने लगा दिये ।। 

कुछ यूँ समय की जोत ने रौशन किये दयार । 
हम जैसे बे-ठिकाने ठिकाने लगा दिये ॥ 

ऐ कारोबारे-इश्क ख़सारा ही कुछ उतार । 
साँसों ने बेशुमार ख़ज़ाने लगा दिये ॥ 

दुनिया हमारे नूर से वैसे भी दंग थी । 
और उस पे चार-चाँद पिया ने लगा दिये ॥ 

सहर – सुबह; मुन्तज़िर - के लिये प्रतीक्षारत 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी 

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
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3 ग़ज़लें इरशाद खान सिकन्दर


रूह से तोड़के सबने बदन से जोड़ दिया

रिश्ता-ए-इश्क़ के धागे को धन से जोड़ दिया

है मिरा काम मुहब्बत की पैरवी करना

जबसे इक चाँद ने मुझको किरन से जोड़ दिया

मैं उसे ओढ़के फिरता था दश्त भर लोगो

क्यों मिरा जिस्म किसी पैरहन से जोड़ दिया

वक़्त ने तोड़ दिया था मगर तअज्जुब है

आपने दिल को मिरे इक छुअन से जोड़ दिया

मेरी ग़ज़लों ने मुहब्बत की नींव रक्खी है

बेवतन जो था उसे भी वतन से जोड़ दिया

शह्र के लोगों को ये बात नागवार लगी

गाँव का दर्द भी हमने सुख़न से जोड़ दिया

अब तो लाज़िम है सियासत के कुछ हुनर सीखें

शाह ने हमको भी इक अंजुमन से जोड़ दिया





कल रात पूरी रात तिरी याद आई है
जानाँ ये मेरे इश्क़ की पहली कमाई है


मैं इन दिनों हूँ हिज्र की लज़्ज़त में मुब्तला
इक उम्र काम करके ये तनख़्वाह पाई है


हाज़िर हूँ अपने दिल की मैं खाता-बही के साथ
ये मैं हूँ और ले ये तिरी पाई-पाई है


ख़ारिज सिरे से कर दिया सबकी दलील को
जब भी चलाई इश्क़ ने अपनी चलाई है 

तकिये का हाल देखके लगता है रातभर
सब आँसुओं ने ख़्वाब की बरसी मनाई है


जबसे सुना कि इश्क़ तिजारत मुफ़ीद है
हमने भी दिल दिमाग़ की पूँजी लगाई है


शाइस्तगी बनी ही मिरे ख़ानदान से
लहजे में ये मिठास बुज़ुर्गों से आई है


इक पल भी इस जहान से निभनी मुहाल थी
हमने किसी के इश्क़ में जग से निभाई है


तस्वीर का ये रुख भी ‘सिकन्द’ है क्या अजब

जब रंग उड़ गया तो ग़ज़ल रंग लाई है

बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन
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तेरे अल्फ़ाज़ के पत्थर मिरे सीने पे लगे
मेरे अहसास के टुकड़े मिरे चेहरे पे लगे


हमने उनको भी कलेजे से लगा रक्खा है
संग जो भी हमें महबूब के सजदे पे लगे

इतना सुनने से तो अच्छा था कि मर ही जाता
मेरी आवाज़ पे पहरे तिरे कहने पे लगे


मैं तिरे इश्क़ में ऐसा हूँ तो ऐसा ही सही
लगे इलज़ाम अगर तौर तरीक़े पे लगे


इश्क़ ने तेरी बहाली की बिना रक्खी है
देखियो! कोई न धब्बा तिरे ओहदे पे लगे


इससे पहले तो ज़मीं थी, वो फ़लक था, दिल था
ये तो दीवार से हम आपके आने पे लगे


क्या नज़ारा था गले आज लगे वो ऐसे
जैसे जुमला कोई आकर किसी जुमले पे लगे


वो तो हम थे जो कभी आह क्या उफ़ तक भी न की
जब कि सब तीर तिरे सीधे कलेजे पे लगे


टस से मस भी जो हुआ मैं तो ‘सिकंदर’ कैसा

लाख कैंची मिरे मज़बूत इरादे पे लगे
बहरे रमल मुसम्मन मख़बून महज़ूफ़
फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन
2122 1122 1122 22

:- इरशाद खान सिकन्दर 
– 9818354784

कुछ भी नहीं है बाकी बाज़ार चल रहा है - सालिम सलीम



कुछ भी नहीं है बाकी बाज़ार चल रहा है
ये कारोबारे-दुनिया बेकार चल रहा है

वो जो ज़मीं पे कब से एक पाँव पे खड़ा था
सुनते हैं आसमाँ के उस पार चल रहा है

कुछ मुज़्महिल सा मैं भी रहता हूँ अपने अन्दर
वो भी कई दिनों से बीमार चल रहा है

शोरीदगी हमारी ऐसे तो कम न होगी
देखो वो हो के कितना तैयार चल रहा है

तुम आओ तो कुछ उस की मिट्टी इधर-उधर हो
अब तक तो दिल का रसता हमवार चल रहा है

मुज़्महिल – थका-माँदा, शोरीदगी – जुनून,  हमवार – सपाट, सीधा, चिकना, बिना ऊबड़-खाबड़ वाला

सालिम सलीम
9540601028



बहरे मज़ारिअ मुसम्मन मक्फ़ूफ़ मक्फ़ूफ़
मुख़न्नक मक़्सूर
मफ़ऊलु फ़ाइलातुन मफ़ऊलु फ़ाइलातुन
221 2122 221 2122


तज दे ज़मीन, पंख हटा, बादबान छोड़ - तुफ़ैल चतुर्वेदी

तज दे ज़मीन, पङ्ख हटा, बादबान छोड़
गर तू बग़ावती है, ज़मीं-आसमान छोड़

ये क्या कि पाँव-पाँव सफ़र मोतियों के सम्त
हिम्मत के साथ बिफरे समन्दर में जान छोड़

ख़ुशबू के सिलसिले दे या आहट की राह बख़्श
तू चाहता है तुझसे मिलें, तो निशान छोड़

बुझते ही प्यास तुझको भुला देंगे अहले-दश्त
थोड़ी-सी तश्नगी का सफ़र दरमियान छोड़
अहले-दश्त – जङ्गल के लोग

मैं चाहता हूँ अपना सफ़र अपनी खोज-बीन
इस बार मेरे सर पे खुला आसमान छोड़

क्यों रोकता है मुझको इशारों से बार-बार
सच सुनना चाहता है तो मेरी ज़बान छोड़

मुझको पता चले तो यहाँ कौन है मेरा
आ सामने तो मेरी तरफ, खुल के बान छोड़

:- तुफ़ैल चतुर्वेदी


बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

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दालान में कभी-कभी छत पर खड़ा हूँ मैं - सालिम सलीम

दालान में कभी-कभी छत पर खड़ा हूँ मैं
सायों के इंतिज़ार में शब भर खड़ा हूँ मैं

क्या हो गया कि बैठ गयी ख़ाक भी मेरी
क्या बात है कि अपने ही ऊपर खड़ा हूँ मैं

फैला हुआ है सामने सहरा-ए-बेकनार
आँखों में अपनी ले के समुन्दर खड़ा हूँ मैं
सहरा – रेगिस्तान, कनार – [समुद्र का] किनारा

सन्नाटा मेरे चारों तरफ़ है बिछा हुआ
बस दिल की धड़कनों को पकड़ कर खड़ा हूँ मैं

सोया हुआ है मुझ में कोई शख़्स आज रात
लगता है अपने जिस्म से बाहर खड़ा हूँ मैं

इक हाथ में है आईना-ए-ज़ात-ओ-कायनात
इक हाथ में लिये हुये पत्थर खड़ा हूँ मैं 


बहरे मज़ारिअ मुसमन अख़रब मकफूफ़ मकफूफ़ महज़ूफ़
मफ़ऊलु फ़ाइलातु  मुफ़ाईलु फ़ाइलुन

 221 2121 1221 212

ज़ुल्मत की रह में हर इक तारा बिछा पड़ा है - नवीन

ज़ुल्मत की रह में हर इक तारा बिछा पड़ा है
और चाँद बदलियों के पीछे पड़ा हुआ है

फिर से नई सहर की कुहरे ने माँग भर दी
और सूर्य अपने रथ पर ख़्वाबों को बुन रहा है

नींदें उड़ाईं जिसने, उस को ज़मीं पे लाओ
तारों से बात कर के किस का भला हुआ है

मिटती नहीं है साहब खूँ से लिखी इबारत
जो कुछ किया है तुमने कागज़ पे आ चुका है 

जोशोख़रोश,जज़्बा; ख़्वाबोख़याल, कोशिश
हालात का ये अजगर क्या-क्या निगल चुका है

जब जामवंत गरजा हनुमत में जोश जागा
हमको जगाने वाला लोरी सुना रहा है

बहरे मज़ारे मुसम्मन अखरब
मफ़ऊलु फ़ाएलातुन मफ़ऊलु फ़ाएलातुन

२२१ २१२२ २२१ २१२२