बहरे कामिल मुसम्मन सालिम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

हों लाख बरहम हवाएँ लेकिन चिराग़ दिल का बुझा नहीं है - मुमताज़ नाजाँ

हों लाख बरहम हवाएँ लेकिन चिराग़ दिल का बुझा नहीं है

जो तोड़ डाले हमारी हिम्मत जहाँ में ऐसी बला नहीं है
है कौन मक़्तूल कौन मुजरिम, लहू के छींटे बता रहे हैं

ज़माने भर पर है राज़ ज़ाहिर बस एक तुम को पता नहीं है
धरम का लो नाम और उस पर उठाओ फ़ितने कराओ दंगे

अगर ख़ुदा है तुम्हारा वाली तो क्या हमारा ख़ुदा नहीं है?
गुज़र चुके हैं सभी मुसाफ़िर, मकीं कहीं और जा बसे हैं

पड़ी है वीरान दिल की बस्ती कहीं भी कोई सदा नहीं है
ये शाह ए दौरां से जा के कह दो, है हम को मंज़ूर टूट जाना

अना की "मुमताज़" है रिवायत कि सर कहीं भी झुका नहीं है

मुमताज़ नाजाँ
बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
मुतफ़ाइलुन मुतफ़ाइलुन
11212 11212 11212 11212


किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी - नवीन

किसी और में वो लचक न थी किसी और में वो झमक न थी।
जो ठसक थी उस की अदाओं में किसी और में वो ठसक न थी॥

न तो कम पड़ा था मेरा हुनर न तेरा जमाल भी कम पड़ा।
तेरा हुस्न जिस से सँवारता मेरे हाथ में वो धनक न थी॥

फ़क़त इस लिये ही ऐ दोसतो मैं समझ न पाया जूनून को।
मेरे दिल में चाह तो थी मगर मेरी वहशतों में कसक न थी॥

ये चमन ही अपना  वुजूद है इसे छोड़ने की भी सोच मत
नहीं तो बताएँगे कल को क्या यहाँ गुल न थे कि महक न थी॥

मेरी और उस की उड़ान में कोई मेल है ही नहीं ‘नवीन’।
मुझे हर क़दम पै मलाल था और उसे कोई भी झिझक न थी॥

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

बहरे कामिल मुसम्मन सालिम
मुतफ़ाएलुन मुतफ़ाएलुन मुतफ़ाएलुन मुतफ़ाएलुन 
11212 11212 11212 11212