कृष्ण ने चुराया जिया, बड़े चितचोर पिया,
माखन चुरायें नित, चोरी की ही ठानी।
सूरत तुम्हारी प्यारी, जाऊँ मैं तो बलिहारी,
प्रभु तुम अंतर्यामी, वेदों की है वानी।।
हे नटवर नागर, जाऊँ मैं तो वारी।
बसो आप मेरे मन, क्लेश मिटे सब तन,
करती रहूँ भजन, बोले राधा प्यारी।
कृष्ण बसें राधा मन, दोनों ही हैं एक तन,
मुरली की धुन सुन, भागें गोपी सारी।
सबका चुराया जिया, कैसा तूने जादू किया,
प्रीत डोर ऐसी बांधी, राधा रानी हारी।।
सुध-बुध भूलीं सारी, कृष्णा की दीवानी।
विष प्याला राणा दिया, मीरा उसको पी लिया,
अमर हुई हैं देखो, राजा की ये रानी।
लगन लगाई ऐसी, योगी भी न करें जैसी,
प्रेम में ही डूबने की, मीरा जी ने ठानी।
घर बार मीरा छोड़ा, हरि से है नाता जोड़ा,
रिश्ते नातों को है तोड़ा, आत्मा थी वो ज्ञानी।।
पहले तीन चरणों में आठ-आठ वर्ण तथा चौथे चरण में दो बार मगण लिया गया है.
मगण अर्थात ‘मा-ता-रा’ अर्थात तीन बार दीर्घ वर्ण.

मेरी रचना को स्थान देने के लिए साहित्यम पत्रिका का बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार🙏
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