पहली फूँक किसने मारी होगी
धुएं से भरे चूल्हे की आग
जलाने के लिए कभी
या आग से जली त्वचा पर मारी होगी
पहली फूँक किसी अपने ने
उसकी दाहकता कम करने के लिए
या बच्चे की आँख की किरकिरी
को
निकालने के लिए माँ ने हौले
से फूँक मारी होगी
या गर्म दूध को शीतल कर पीने
लायक
बनाया होगा माँ की ही
ममतामयी फूँक ने
या स्कूल की बेंच पर साथ
बैठी सहेली ने फूँक मारी होगी
आँख के तिनके को निकालने के
लिए कभी
अथवा कभी दुःख की घड़ी में
किसी ख़ास ने
आश्वासन की फूँक मार कर
दुःख को और हमको सहज किया
होगा
या किसी नव तरुणी के गाल पर
लहराती लट पर
फूँक मारी होगी उसके प्रेमी
ने
उसको छेड़ते हुए
अठखेलियाँ करते हुए
या दादी ने पोपले मुँह से
फूँक कर
पोते की चोट को दुलराया होगा
तो वह खिलखिलाया होगा
या आपने ही हल्की फूँक से
चाय पर पड़ी मलाई को
कप के सिरे तक पहुँचाया होगा
या लकड़ी की पटरी या स्लेट
को सुखाने के लिए
हवा में हिला कर या फूँक मार
कर
कभी जल्दी-जल्दी सुखाया होगा
या दोस्तों के संग चलते -
चलते
राह पर लगी लाजवंती के पौधे
की पत्तियों कोबिन छुए
अपनी फूँक से ही लजवाया होगा
तुम भी कभी फूँक मारना यादों
के पन्नों पर
जमी हुई कुछ धूल उतर जाएगी
और नज़र आएंगी साथ बिताए सुखद
पलों की
अनमोल स्पष्ट छवियाँ
कभी फूँक मारना नन्हें शिशु
के कोमल केश पर
और देखना उसका खिलखिला कर
हँसना
जो देगा अहसास ईश्वर की
मौजूदगी का
कभी बाँसुरी की तान को आँखें
मूँद कर सुनना
आभास होगा हर फूँक में कृष्ण
के होने का
गोपियों की बेचैनी भी तब समझ
आएगी
कि वे बाँसुरी की धुन पर सब
छोड़ कर
क्यों दौड़ जाती थीं कदंब की
ओर
लोकलाज त्याग कर
कृष्ण से एकाकर होने का यह
भी एक सुंदर बहाना ही है
जो अंतर से सारे अंतर मिटा देता है

यह कविता पढ़ते ही दिल किसी पुराने आँगन में चला जाता है। आप फूँक जैसे छोटे से काम में इतना बड़ा जीवन भर देते हैं कि हर पंक्ति याद बन जाती है। माँ, दादी, दोस्त, प्रेम और कृष्ण, सब एक साँस में आ जाते हैं। आप सवाल पूछते हुए जवाब नहीं देते, बल्कि यादें जगा देते हैं।
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