लघुकथा - दीपक बनो - डॉ. पूजा हेमकुमार अलापुरिया 'हेमाक्ष'

मंथन अपने दादा जी के साथ शाम की सैर करने निकला और कुछ दूर चलने पर दादा जी को उनका भतीजा पंकज मिला। पंकज ने ताऊजी को देखकर अनदेखा करने का प्रयास किया, मगर ताऊजी ने पंकज को आवाज दी और कुशल क्षेम पूछा और आशीर्वाद देते हुए दीपक बनने की सलाह देते हुए आगे बढ़ गए।  

 कुछ कदम आगे आने पर मंथन ने दादा जी से पूछा, "दादा जी आपने चाचा जी को बड़ा अजीब सा आशीर्वाद दिया है। मैं कुछ समझा नहीं।"

 

दादा जी ने आश्चर्य से पूछा, "अजीब सा!!" मंथन ने कहा,"हाँ! अजीब-सा।"

 

दादा जी ने पूछा, "क्यों?"

 

मंथन ने (अबोध मन से) कहा,"सब लोग आशीर्वाद देते समय कहते हैं - डॉक्टर बनो, इंजीनियर बनो, आई.ए.एस. ऑफिसर बनो ...! लेकिन आपने कहा 'दीपक बनो'। मैं कुछ समझा नहीं।"

 

दादा जी ने मंथन से कहा,"बेटा, दीपक कभी दूसरों से नहीं जलता, बल्कि दूसरों के लिए जलता है।" 

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