कविता - मैं दुखी हूँ - सन्ध्या यादव

 

मैं  दुखी हूँ...

मैं बहुत दुखी हूँ...

पर उतनी नहीं ,

जितनी वो माँ है

जिसकी बेटी के अधमरे शरीर को

गुंडे घर में फेंक गये चार दिन बाद,

व्यंग्य - आ बैल मुझे मार - अर्चना चतुर्वेदी

 यदि आप आ बैल मुझे मार टाइप कहावत का वास्तविक अनुभव लेना चाहते हैं और गलती से या खुशनसीबी से आप साहित्य की दुनिया में भी हैं तो आप चाचा मामा पिता पत्नी जिससे भी आपको प्रेम हो तुरंत उनके नाम से एक पुरस्कार शुरू कर दें , यदि आपको सिर्फ खुद से प्रेम हो और खुद को महान भी समझते हैं तो अपने मरने का इंतजार करने की जरूरत नही आप अपने नाम से ही पुरस्कार शुरू कर दें आपकी महानता में चार चाँद लगाने का कार्य दूसरे कर ही देंगे ।

व्यंग्य - साहित्य का रेंगता कीड़ा - मुकेश असीमित

  

चैम्बर में बैठा अपने पीछे की अभी तक खाली पडी अलमारी को देख रहा हूँ ,आलमारी में शीशे लगवा लिए ,बस इंतज़ार है तो कुछ दो चार पुरुस्कारों का जो भूले भटके से कोई मेरी झोली में भी डाल दे! 

देखोपुरस्कार की सब जगह पूछ है। बिना पुरुस्कृत लेखक समाज में तिरस्कृत सा डोलता है। पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक भी उन्ही लेखकों

सॉनेट - हम तुम्हारी बात सुनना चाहते हैं - नकुल गौतम



छू नहीं पाये कभी गेसू तुम्हारे

दस्तरस थी फूल की बस डायरी तक

बात होठों तक नहीं पहुँची हमारे

इश्क सिमटा रह गया बस शायरी तक

नवगीत - शर्त है पर - सीमा अग्रवाल


हम  लहर पर आज ही

दीपक सिराना छोड़ देंगे 

शर्त है, पर,

तुम तमस से

आँख डाले आँख में

बातें करोगे

व्यंग्य - कर लेना काम है सरकार का - कमलेश पाण्डेय

टैक्स को कर कहा गया है। यही करदाता के करों से किसी कर्ता के हाथों में आकर उसे कुछ करने की प्रेरणा और शक्ति देता है। कर सभी देते हैंवो भी जिनकी कमर कर के बोझ से टूटी हुई होती हैमगर कर्ता गिने चुने ही होते हैं जिन्हें करों की राशि से संपन्न होने वाले काजों से अच्छा कट प्राप्त होता है। कर चाहे कड़ाई से वसूला जाता होउससे

ग़ज़ल - अजीब दिन हैं कि लगता है रात चल रही है - आफ़ताब हुसैन

 

 

अजीब दिन हैं कि लगता है रात चल रही है

जो हो चुकी है वही वारदात चल रही है 

तज़मीन - अश्विनी उम्मीद

 


तुम यही बोलोगे – मुश्किल है सफ़र – मालूम है 

और दिखाओगे हमें रस्ते का डर – मालूम है

व्यंग्य - सच्चे देशभक्त - अर्चना चतुर्वेदी

हम भारतीय लोग दिल से बड़े ही प्यारे होते हैं और बड़े ही एडजस्टिंग टाइपहम हर त्यौहार हर माहौल में खुद को सेट कर लेते हैं | जैसे वेलेंटाइन डे और करवा चौथ पर हम सोहनी महिवाल और शिरी फरहाद को भी कोम्प्लेक्स दे सकते हैं | मदर्स डे और फादर्स डे पर हर तरफ श्रवण कुमार की खेती लहलहाने लगती है | ठीक उसी तरह 26

ग़ज़ल - जहाँ पे कानों ने सुनने का फ़न उतार दिया - नवीन जोशी 'नवा'


 

जहाँ पे कानों ने सुनने का फ़न उतार दिया

वहाँ हमारी ज़बाँ ने सुख़न उतार दिया

 

न जाने अब के ये कैसी बहार आई है

गुलों के जिस्मों से जिस ने चमन उतार दिया

कविता - अब तुम मर क्यों नहीं जाते दद्दा - सन्ध्या यादव


"बुढ़ऊ कमरा छेके बैइठे हैं "

बेटे -बहुरिया के ये संस्कारी

आत्म -सम्वाद दिन में पचास बार

सुनने और पोते -पोतियों को 

"मेरा कमरा " के नाम पर

लड़ने-झगड़ने के बाल सुलभ

आशावादीस्वप्निल वार्तालाप को

सुन दद्दा की ऐंठी गर्दन

तकिये पर थोड़ी और सख़्त

हो जाती है ...

पुस्तकें / पत्रिकाएं प्राप्त हुईं

पुस्तक का नाम - शिव-स्तोत्र सिन्धु 
विवरण - प्रमुख शिव-स्तोत्रों के उर्दू काव्यानुवाद 
अनुवादक - ज़ाहिद अबरोल 
अनुवादक मोबाइल नम्सबर - 9816643939
प्रकाशक - बिम्ब प्रतिबिम्ब प्रकाशन, फगवाड़ा, पंजाब 
प्रकाशक मोबाइल नम्बर - 8528833317, 9877545648
मूल्य - रु.250.00

कविता - भोर - अनिता सुरभि

 


संवेदनाओं के पोरों से

अंधेरे को पीछे धकेल

आँखें मलती किरणों को 

अपने अन्तर्तम में सहेज

सुनहरा दिन

आसमान की साँकल खोल

धीरे-धीरे धरा पर

उतरता है, तो

त्रिलोक सिंह ठकुरेला के कुण्डलिया छन्द

 


कविता जीवन सत्व हैकविता है रसधार ।

अलंकार,रस,छंद में, भाव खड़े साकार ।।

भाव खड़े साकार, कल्पना जाग्रत  होती ।

कर देते धनवान, शब्द के उत्तम  मोती । 

'ठकुरेला' कविराय, हरे तम जैसे सविता ।

ग़ज़ल - नहीं ऐसा नहीं लम्हे फ़क़त ग़मगीन आये हैं - देवमणि पाण्डेय

 


नहीं ऐसा नहीं लम्हे फ़क़त ग़मगीन आये हैं

मेरे हिस्से में ख़ुशियों के भी पल दो तीन आये हैं

नज़्म - मेरे पापा – अलका मिश्रा

  

वो मेरे मसीहा हैं वही मेरे ख़ुदा हैं

ये सच है मेरे पापा ज़माने से जुदा हैं

 

बचपन में मुझे बाहों के झूले में झुलाया

हर दर्द मेरा अपने कलेजे से लगाया

कविता - मैं लौटना चाहता हूँ - हृदयेश मयंक


दुखों को पार कर

मैं लौटना चाहता हूँ

जैसे लौट आता है सूरज

रोज़ रोज़ अल सुबह

 

मैं लौटना चाहता हूँ

जैसे लौट आता है चाँद

बुशरा तबस्सुम की क्षणिकाएं


ये सत्य है कि तुमसे प्रेम है

प्रेमरत जिसे निहारती हूँ रोज़ 

उस चाँद का घटना-बढ़ना भी सत्य है

कड़ुआ सच यह भी है कि

पूर्णता में चाँद की

सड़क किनारे खड़े वृक्षों में

जो चमकता है सर्वाधिक

वो एक ठूँठ है

निर्बाध चलती सड़क भी सत्य है

शेष सब झूठ है...

माज़ी की गलियाँ - मुमताज़ अज़ीज़ नाज़ाँ



ये माज़ी की गलियाँ, वो यादों के घेरे

जहाँ रात-दिन हैं उदासी के फेरे

हैं अंजान से जाने-पहचाने चेहरे

मेरे दर्द-ओ-वहशत से बेगाने चेहरे

हैं ओढ़े मोहज़्ज़ब वफ़ा की नक़ाबें

पिये हैं जो जी भर ख़ुदी की शराबें

है इन पर चढ़ा उल्फ़तों का मुलम्मा

हैं बातें पहेली, अदाएँ मोअम्मा

हैं बदशक्ल चेहरे नक़ाबों के पीछे

मुबारक साल नया – देवमणि पाण्डेय



आकाश में दिन भर जलकर जब

घर लौट के सूरज आया है

तब शाम ने अपने आंचल में

हौले से उसे छुपाया है

एक बड़े आदमी की पत्नी हूँ मैं – सन्ध्या यादव



भाग्यशाली हूँ, ईर्ष्या, कुण्ठा, प्रतिस्पर्धा का कारण हूँ

वैसे तो रीढ़ की हड्डी ही उसके संसार की हूँ ,पर

ब्रांडेड, चमकदार कपड़ों से ढँकी -छुपी रहती हूँ

एक बड़े आदमी की पत्नी हूँ मैं…

संस्कृत दोहे हिन्दी अर्थ सहित - डॉ. लक्ष्मीनारायण पाण्डेय


 

याति भीतिभयभीषणं वर्षं दर्पितमेव,

जनयेज्जनगणमङ्गलं ,नववर्षं हे देव !


 भीतिभूखभय से भरा रुग्ण गया चौबीस ।

जनगणमनमंगल करे,हे भगवन् पच्चीस ।

दोहे - राजमूर्ति 'सौरभ'


 

राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।

दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना नाम।।

 

एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों याम।

साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।

एक नायाब पेशकश - 2024 की दिलकश ग़ज़लें

25 अगस्त, 1953 को  जितौरा ,पियरो,आरा , बिहार में जन्मे आदरणीय रमेश कँवल जी भी उन चुनिन्दा लोगों में शामिल हैं जिनकी कि ऊर्जा कोविड के  बाद कई गुना बढ़ गयी. कोविड की त्रासदी को दरकिनार करते हुए आप ने ईसवी सन 2021 में विभिन्न शायरों द्वारा

नये साल के दोहे - रमेश शर्मा



आई है नव वर्ष की, नई नवेली भोर ।

खिड़की से दिल की मुझे, झाँक रहा चितचोर ।।

 

पहुँची हो चौबीस में, लेखन से कुछ ठेस ।

क्षमा ह्रदय से माँगता, उनसे आज रमेश ।।

बुलबुल का भी दिल अब पिंजरे में शायद बेताब नहीं होता - मसऊद जाफ़री



बुलबुल का भी दिल अब पिंजरे में शायद बेताब नहीं होता

जिस दिन से सुना है   फूलों पर वो हुस्नो शबाब नहीं होता

वक़्त को मैने कुछ इस तरह बदलते देखा - हसन फ़तेहपुरी



वक़्त  को मैने कुछ  इस तरह  बदलते देखा

चढ़ते  सूरज को सर-ए-शाम ही ढलते देखा

मेरी बे-लौस चाहत का भरम रख - पूनम विश्वकर्मा



मेरी बे-लौस चाहत का भरम रख

कहीं दिल में मुझे भी तो सनम रख

लोकतंत्र उर्फ़ ढीठ तंत्र - अनिल गौड़

राजनीति में कितना बल है

वह हर चीज़ बदल सकती है

अपने हित में जो संभव है

उस कुमार्ग पर चल सकती है