करत आहेस तू अभ्यास कसला
कुठे आहे तुला व्यवहार कळला
मैं दुखी हूँ...
मैं बहुत दुखी हूँ...
पर उतनी नहीं ,
जितनी वो माँ है
जिसकी बेटी के अधमरे शरीर को
गुंडे घर में फेंक गये चार दिन बाद,
चैम्बर में बैठा अपने पीछे की अभी तक खाली पडी अलमारी को देख रहा हूँ ,आलमारी में शीशे लगवा लिए ,बस इंतज़ार है तो कुछ दो चार पुरुस्कारों का जो भूले भटके से कोई मेरी झोली में भी डाल दे!
देखो, पुरस्कार की सब जगह पूछ है। बिना पुरुस्कृत लेखक समाज में तिरस्कृत सा डोलता है। पत्र पत्रिकाओं के प्रकाशक भी उन्ही लेखकों
छू नहीं पाये कभी गेसू तुम्हारे
दस्तरस थी फूल की बस डायरी
तक
बात होठों तक नहीं पहुँची
हमारे
इश्क सिमटा रह गया बस शायरी तक
टैक्स को कर कहा गया है। यही करदाता के करों से किसी कर्ता के हाथों में आकर उसे कुछ करने की प्रेरणा और शक्ति देता है। कर सभी देते हैं, वो भी जिनकी कमर कर के बोझ से टूटी हुई होती है, मगर कर्ता गिने चुने ही होते हैं जिन्हें करों की राशि से संपन्न होने वाले काजों से अच्छा कट प्राप्त होता है। कर चाहे कड़ाई से वसूला जाता हो, उससे
हम भारतीय लोग दिल से बड़े ही प्यारे होते हैं और बड़े ही एडजस्टिंग टाइप, हम हर त्यौहार हर माहौल में खुद को सेट कर लेते हैं | जैसे वेलेंटाइन डे और करवा चौथ पर हम सोहनी महिवाल और शिरी फरहाद को भी कोम्प्लेक्स दे सकते हैं | मदर्स डे और फादर्स डे पर हर तरफ श्रवण कुमार की खेती लहलहाने लगती है | ठीक उसी तरह 26
जहाँ पे कानों ने सुनने का फ़न उतार दिया
वहाँ हमारी ज़बाँ ने सुख़न
उतार दिया
न जाने अब के ये कैसी बहार
आई है
गुलों के जिस्मों से जिस ने चमन उतार दिया
"बुढ़ऊ कमरा छेके बैइठे हैं "
बेटे -बहुरिया के ये
संस्कारी
आत्म -सम्वाद दिन में पचास
बार
सुनने और पोते -पोतियों को
"मेरा कमरा " के
नाम पर
लड़ने-झगड़ने के बाल सुलभ
आशावादी, स्वप्निल वार्तालाप को
सुन दद्दा की ऐंठी गर्दन
तकिये पर थोड़ी और सख़्त
हो जाती है ...
संवेदनाओं के पोरों से
अंधेरे को पीछे धकेल
आँखें मलती किरणों को
अपने अन्तर्तम में सहेज
सुनहरा दिन
आसमान की साँकल खोल
धीरे-धीरे धरा पर
उतरता है, तो
कविता जीवन सत्व है, कविता है रसधार ।
अलंकार,रस,छंद
में, भाव खड़े साकार ।।
भाव खड़े साकार, कल्पना
जाग्रत होती ।
कर देते धनवान, शब्द
के उत्तम मोती ।
'ठकुरेला' कविराय, हरे तम जैसे सविता ।
वो मेरे मसीहा हैं वही मेरे
ख़ुदा हैं
ये सच है मेरे पापा ज़माने से
जुदा हैं
बचपन में मुझे बाहों के झूले
में झुलाया
हर दर्द मेरा अपने कलेजे से लगाया
दुखों को पार कर
मैं लौटना चाहता हूँ
जैसे लौट आता है सूरज
रोज़ रोज़ अल सुबह
मैं लौटना चाहता हूँ
जैसे लौट आता है चाँद
ये सत्य है कि तुमसे प्रेम है
प्रेमरत जिसे निहारती हूँ
रोज़
उस चाँद का घटना-बढ़ना भी
सत्य है
कड़ुआ सच यह भी है कि
पूर्णता में चाँद की
सड़क किनारे खड़े वृक्षों
में
जो चमकता है सर्वाधिक
वो एक ठूँठ है
निर्बाध चलती सड़क भी सत्य
है
शेष सब झूठ है...
ये माज़ी की गलियाँ, वो यादों के घेरे
जहाँ रात-दिन हैं उदासी के फेरे
हैं अंजान से जाने-पहचाने चेहरे
मेरे दर्द-ओ-वहशत से बेगाने चेहरे
हैं ओढ़े मोहज़्ज़ब वफ़ा की नक़ाबें
पिये हैं जो जी भर ख़ुदी की शराबें
है इन पर चढ़ा उल्फ़तों का मुलम्मा
हैं बातें पहेली, अदाएँ मोअम्मा
हैं बदशक्ल चेहरे नक़ाबों के पीछे
भाग्यशाली हूँ, ईर्ष्या, कुण्ठा, प्रतिस्पर्धा का कारण हूँ
वैसे तो रीढ़ की हड्डी ही उसके संसार की हूँ ,पर
ब्रांडेड, चमकदार कपड़ों से ढँकी -छुपी रहती हूँ
एक बड़े आदमी की पत्नी हूँ मैं…
याति भीतिभयभीषणं वर्षं दर्पितमेव,
जनयेज्जनगणमङ्गलं ,नववर्षं हे
देव !
जनगणमनमंगल करे,हे भगवन् पच्चीस ।
राधे! राधे!राधिका, मोहन!मोहन! श्याम।
दोनों ही जपने लगे,अपना-अपना
नाम।।
एक दूसरे को जपें, निशिदिन, आठों
याम।
साधारण प्रेमी नहीं, हैं राधा-घनश्याम।।
25 अगस्त, 1953 को जितौरा ,पियरो,आरा , बिहार में जन्मे आदरणीय रमेश कँवल जी भी उन चुनिन्दा लोगों में शामिल हैं जिनकी कि ऊर्जा कोविड के बाद कई गुना बढ़ गयी. कोविड की त्रासदी को दरकिनार करते हुए आप ने ईसवी सन 2021 में विभिन्न शायरों द्वारा
आई है नव वर्ष की, नई नवेली भोर
।
खिड़की से दिल की मुझे, झाँक रहा
चितचोर ।।
पहुँची हो चौबीस में, लेखन से कुछ
ठेस ।
क्षमा ह्रदय से माँगता, उनसे आज रमेश ।।
बुलबुल का भी दिल अब पिंजरे में शायद बेताब नहीं होता
जिस दिन से सुना है फूलों पर वो हुस्नो शबाब नहीं होता