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SP/2/1/2 नदी हुई नव-यौवना, बूढ़ा पुल बेचैन - म. न. नरहरि


!!सभी साहित्य रसिकों का सादर अभिवादन!!

यत्र-तत्र विचरण करते जलधरों [बादलों] को एक दूसरे के समीप ला कर, अपने गुण-धर्म का सदुपयोग करते हुये उन बादलों में घर्षण उत्पन्न कर के जन-जीवन के लिए मूसलाधार बरसात उपलब्ध करवाती है पवन। इस ब्लॉग का भी यही प्रयास रहा है कि तमाम विद्वानों / विदुषियों को एक बिन्दु पर एकत्र कर के उन के अगाध परिश्रम के द्वारा अर्जित ज्ञान व अनुभव को आने वाली पीढ़ियों के हितार्थ उपलब्ध करवाना। वर्तमान श्रंखला वक्रोक्ति-विरोधाभास पर चर्चा ज़ारी रखे हुये है, मुखर होते स्वरों की पहिचान पर बतिया रही है; ऐसे में मंच कुछ और दोहों को ले कर सफ़र को आगे बढ़ाने का यत्न करता है। आज की पोस्ट में हम पढ़ते हैं मुंबई निवासी वरिष्ठ साहित्यसेवी आदरणीय श्री म. न. नरहरि [नरहरि अमरोहवी] जी के दोहे:-

ठेस;
मूरख मैं साबित हुआ, फक्कड़ मिला ख़िताब
घाटा सब मैंने भरा, ऐसे हुआ हिसाब