18 October 2013

अपनी हद पर ही कमोबेश क़दम रखते हैं - नवीन

[नया काम]

अपनी हद पर ही कमोबेश क़दम रखते हैं
हम समन्दर हैं किनारों का भरम रखते हैं 

उन से किस तर्ह निभे आप ही कहिये साहब
वो तो जब देखो तराज़ू पे क़लम रखते हैं 

अब हमें तैश नहीं बल्कि तरस आता है
जब हथेली पे नज़रबाज़ रक़म रखते हैं 

ऐ अँधेरो तु्म्हें किस बात का डर है हम से 
हम तो सीने में जलन कम से भी कम रखते हैं 

दिल के गमले में सिसकते हुये जज़्बात नहीं 
ख़ुश्बु-ए-इश्क़ उड़ाते हुये ग़म रखते हैं 

एक भी मन का मरज़ हम से मिटाया न गया 
दुश्मनों को भी बड़े चाव से हम रखते हैं 

हम भी औरों की तरह जिस्म के अन्दर एक दिल
सिर्फ़ सुन्दर ही नहीं सुन्द-र-तम रखते हैं




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अपनी हद पर ही कमोबेश क़दम रखते हैं
हम समन्दर हैं किनारों का भरम रखते है

जाने किस तर्ह ज़माने में लगा देते हैं आग
वो जो सीने में जलन कम से भी कम रखते हैं

क्या कहा जिस को भी चाहेंगे उठा देंगे आप
आओ इस बार तराजू पे कलम रखते हैं

ये भी सुन्दर है, सितमगर है, सलासिल, सरगुम
अब से दुनिया का भी इक नाम सनम रखते हैं
सलासिल - सिलसला का बहुवचन, बेड़ियाँ, जंजीरें
सरगुम - जिस का आदि-अन्त न हो, एक ईश्वरीय गुण

सिर्फ़ औज़ार के जैसा ही समझते हैं उसे
जिस हथेली पे नज़रबाज़ रक़म रखते हैं

तुम ही कहते थे ग़ज़ल ज़ख्मों को भर देगी 'नवीन'
तुम भी जिद छोड़ दो और हम भी कलम रखते हैं

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

फ़ाएलातुन फ़एलातुन फ़एलातुन फालुन
बहरे रमल मुसम्मन मखबून मुसक्कन

2122 1122 1122 2

15 October 2013

सच कहने से फ़र्ज़ अदा हो जाता है - नवीन

सच कहने से फ़र्ज़ अदा हो जाता है
लेकिन सब का दिल खट्टा हो जाता है

हरे नहीं करने हैं फिर से दिल के ज़ख़्म
हस्ती का उनवान ख़ला हो जाता है

स्टेज ने मेरा नाम भी छीन लिया मुझसे
क्या कीजे! किरदार बड़ा हो जाता है

इसी जगह इन्सान पलटता है तक़दीर
इसी जगह इन्सान हवा हो जाता है

जिसकी नस्लें उसके साथ नहीं रहतीं
ऐसा देश अपाहिज सा हो जाता है

ज्ञान अकड़ कर आता है भक्तों के पास
बच्चों से मिल कर बच्चा हो जाता है
[सन्दर्भ - उद्धव-गोपी सम्वाद]

यार ‘नवीन’ अब इतना भी सच मत बोलो
सारा कुनबा संज़ीदा हो जाता है


नवीन सी चतुर्वेदी

13 October 2013

दुर्गा! दुर्गतिनाशिनी, दक्षा, दयानिधान - आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

नमस्कार

आप सभी को विजयादशमी की अनेक शुभकामनाएँ। परमपिता परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि आप के जीवन में आनन्द ही आनन्द भर दें। साथियो वर्तमान आयोजन की समापन पोस्ट है आज की पोस्ट और इसीलिये विशिष्ट भी। आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी ने विशिष्ट दोहे रचे हैं। एक ही अक्षर ‘द’ पर नवदुर्गा के चरणों में इतने और ऐसे दोहे प्रस्तुत कर पाना माँ की अनुकम्पा से ही सम्भव हैं। इन दोहों में अलंकारों की भरमार है। हमारे मध्य विद्वान अपरिमित मात्रा में हैं, तो ऐसे साथियों से निवेदन है कि पाठकों के आनन्द को बढ़ाने के उद्देश्य से इन दोहों की मीमांसा करने की कृपा करें। चूँकि शब्दकोश की मदद के बग़ैर आप को डगर कठिन लग सकती है इसलिये दोहों की संख्या सीमित रखी गयी है और सम्भवत: शब्दार्थ भी दिये जा रहे हैं।

दुर्गा! दुर्गतिनाशिनी, दक्षा, दयानिधान
दुष्ट-दंडिनी, दगदगीदध्यानी द्युतिवान
(दुर्गा = आद्याशक्ति, दुर्गतिनाशिनी = बुरी दशा को नष्ट करनेवाली, दक्षा = दक्ष पुत्री, दयानिधान = दया करनेवाली, दुष्ट-दंडिनी = दुष्टों को दंड देनेवाली, दगदगी – चमकदार, दध्यानी = सुदर्शन, द्युतिवान = प्रकाशवान)

दीप्तिचक्र दिप-दिप दिपे, दमकें दीप हजार
दर्शन दे दो दक्षजा, दया-अमिय दातार
(दीप्तिचक्र = ज्योति-वलयदिप-दिप = झिलमिलदिपे = चमके, दक्षजा दक्ष से उत्पन्न सती, अमिय = अमृत, दातार = देनेवाला)

दयामयी वरदायिनी, दिल से दिखा दुलार
दिव्य-देशना दीजिये, देवी जगदाधार
(दिव्य-देशना = दिव्य-उपदेश, जगदाधार = जग का [की] आधार)

दिग्विजयी, दिव्यांगना,, दिगंगना, दिग्व्याप्त
दिक्यामिनि, दिक्सूचिका, देइ देउ दीक्षाप्त
( दिग्विजयी = सभी दिशाओं में जीतनेवाला, दिव्यांगना = दिव्य  देहवाली, दिगंगना = दिशा रूपिणी स्त्री, दिग्व्याप्त दिशाओं में व्याप्त, दिक्यामिनि = दिशरूपी स्त्री, दिक्सूचिका = दिशा-बोध कराने वाली, देइ = देवी, देउ = दीजिये, दीक्षाप्त = दीक्षा+आप्त / पूर्ण दीक्षा)

क्या ही विलक्षण दोहे हमारी झोली में डाले हैं माँ ने। जय हो जय हो जय हो। इन दोहों के साथ ही यह वर्तमान आयोजन अपने चरम पर पहुँचता है और मैं आप सभी से आज्ञा लेता हूँ। दिवाली के बाद की सर्दियों में यदि मौक़ा मिला तो दोहों को ले कर कोई विशेष आयोजन करने का विचार है। आप सभी के सुझाव आमंत्रित किये जाते हैं। फिर मिलेंगे। नमस्कार।

जय माँ शारदे !!!

12 October 2013

सिद्धिदात्रि माँ दीजिये भारत को वरदान - ऋता शेखर मधु

नमस्कार

इस बार का आयोजन एक दम शॉर्ट एण्ड स्वीट है। कल आयोजन का समापन हो जायेगा। आज की पोस्ट में पढ़ते हैं ऋता शेखर मधु जी के दोहे। अन्तर्जाल पर साहित्यिक गतिविधियों में संलग्न व्यक्तियों को पता है कि किस तरह कम ही समय में आप ने छंदों से नाता जोड़ लिया है। देवी के नौ रूप यानि नवदुर्गा के नौ नामों को केन्द्र में रख कर दोहे लिखे हैं आप ने। 

[1] शैलपुत्री [2] ब्रह्म्चारिणी [3] चन्द्र्घण्टा [4] कूष्माण्डा [5] स्कन्दमाता [6] कात्यायिनी [7] कालरात्रि [8] महागौरी [9] सिद्धिदात्री ..... नवदुर्गा के नौ नाम हैं ये

शैलपुत्री
प्रथम दिवस को पूजते, जिनको हम सोल्लास
पुत्री वह गिरिराज की, भरतीं जीवन आस

चन्द्र-शिखर को सोहता, वाहन बनता बैल
पुत्री मिली यशस्विनी, धन्य हुए हिमशैल

ब्रह्मचारिणी
अधीश्वरी हैं शक्ति की, ब्रह्मचारिणी रूप
सौम्यानन्दप्रदायिनी, लागें ब्रह्मस्वरूप

हो विकास सद्बुद्धि का, अरु कुबुद्धि का नाश
ब्रह्मचारिणी से मिले, हर पग दिव्य प्रकाश

चन्द्रघण्टा
जिनकी ग्रीवा में बसे, चन्दा का आह्लाद
चन्द्रघण्टा करें कृपा, खुशियाँ हों आबाद

कूष्माण्डा
त्रिविध ताप संसार का, कूष्माण्डा में युक्त
देवी की आराधना, करती ताप विमुक्त

स्कन्दमाता
अपने आँचल में भरे, ममता की सौगात
बनी पाँचवें रूप में, स्कन्द पुत्र की मात

यत्र तत्र सर्वत्र हैं, भाँति-भाँति सन्ताप
देवी पञ्चम रूप में, करो निवारण आप

कात्यायिनी
कात्यायिनि अवतार में, आईं ऋषि के द्वार
माँ के आशिर्वाद से, मिला विजय का हार

कालरात्रि
आज धरा पर हर जगह, घटता जाय प्रकाश
कालरात्रि के रूप में, तम का करो विनाश

महागौरी
सकल विश्व भटका हुआ, दिखता मद में चूर
मातु महागौरी त्वरित, कृपा करो भरपूर

सिद्धिदात्री
सिद्धिदात्रि माँ दीजिये भारत को वरदान
घर घर सुख आबाद हो, छा जाये मुस्कान


माँ दुर्गा आप की मनोकामना अवश्य पूरी करें। साथियो कल की पोस्ट भी एक विशेष पोस्ट है, अवश्य पाधारिएगा।  

11 October 2013

धर्म ध्वजा की ओट में, होता........पशु संहार - फणीन्द्र कुमार 'भगत'

नमस्कार

पिछली पोस्ट का अनुभव अच्छा नहीं रहा। ख़ैर, ये सब तो जैसे होना ही था। मञ्च को इस बार एक और नये रचनाधर्मी के दोहे मिले हैं। नाम है फणीन्द्र कुमार ‘भगत’ और आप देवास, मध्य-प्रदेश से हैं। अन्तर्जालीय साहित्य-सेवा के विगत वर्षों में मैं ने रचनाधर्मी से अधिक रचना को प्रधानता दी है। परिचय को वरीयता नहीं दी। जहाँ जो ग़लत लगा, बताने में संकोच नहीं किया और बेशक़ यह गुमान नहीं है बल्कि पाठकों को अच्छे-अच्छे छन्द पढ़वाने का दायित्व-बोध है यह। आइये सफ़र को आगे बढ़ाते हुये पढ़ते हैं फणीन्द्र जी के दोहे:-

माता के आशीष से, बिखरा.........ऐसा नूर
कृषक हुए खुशहाल सब, फसल हुई भरपूर

जगराता में मातु के, दर्शन करते लोग
कहीं चढाते पुष्प तो, कहीं लगाते भोग

माँ कुष्मांडा ने रचा, अद्भुत.....यह संसार
थोडे से ग़म भी रचे, खुशियाँ रची अपार

धर्म ध्वजा की ओट में, होता........पशु संहार
क्या सचमुच जग-तारिणी, माँ करती स्वीकार?

दया धर्म का कर्म फल, जीवन का आधार
माँ के सच्चे भक्त का, होता........बेडा पार

माँ के हर इक रूप का, करे ‘भगत’ गुणगान
छंद रचे हैं माप के, समझो इन्हें........प्रमान


धर्म-ध्वजा की ओट में........... वाह क्या दोहा हुआ है, जी हाँ दोहा हुआ है, रचनाधर्मी को बहुत-बहुत बधाई। इस उत्तम दोहे को प्रस्तुत करने का सौभाग्य मिला मुझे, मेरे लिये ख़ुशी की बात है। इसी आयोजन में खुर्शीद भाई का ‘मूरत को गलहार’, अनाम जी का ‘तुम सौम्या, तुम चण्डिका', ओम प्रकाश जी का ‘यों गरबे में दीप’ तथा  सौरभ पाण्डेय जी का ‘बाया-बाया पीर’  भी अपना जलवा बिखेर चुके हैं। आनन्द लीजिये इन दोहों का। इस के बाद बस दो पोस्ट और। 

10 October 2013

हे माता आद्येश्वरी, नमन करूँ शत बार - अनाम


हे माता आद्येश्वरी, नमन करूँ शत बार।
महाशक्ति ब्रह्माण्ड की, पाया आर न पार।।

कण-कण में माँ व्याप्त होधारे रूप हज़ार।
अपने पट पर सृष्टि रच, करिये स्थिति संहार।। 

त्रिगुण रूप कुल विश्व में, माँ तुम ही तुम व्याप्त।
पञ्चभूत बन सब रचे, .........जड़-चेतन को आप्त।।

व्यक्त तुम्हीं, अव्यक्त तुम, चारों वाणी वास।
प्रथम नाद ओँकार तुम, अक्षर सर्व निवास।।

तुम सौम्या, तुम चण्डिका, त्रिपुरसुंदरी रूप।
अष्टभुजा, त्रिनयन धरे, तुम माँ काली रूप।।

एक छोर से दूसरे, तव वैभव बिखराय।
पर्वत, सागर, वन, नदी, तव क्रीड़ा विलसाय।।

मानव तन में वास तव, धर कुण्डलिनी रूप।
भुक्ति-मुक्ति देतीं उसे,.......हे योगेश्वरि रूप।।

दे दे हे माँ मंगला, विश्वशान्ति उपहार।
ले दुर्गा का रूप, कर, दुष्टवृत्ति संहार।।

पोस्ट होने पर रश्मि दीदी ने बताया कि यह दोहे उन के नहीं हैं। ई मेल तपास की तो फिर उन्हों ने कहा कि वह ई मेल भी उन की नहीं है। इस लिये फिलहाल इन दोहों को अनाम नाम के साथ रहने देते हैं। फ्री होने पर इस बारे में सोचा जायेगा। 

9 October 2013

गरबे के रँग में रँगा, सारा हिंदुस्तान - ओम प्रकाश नौटियाल

नमस्कार

ठाले-बैठे के तीन साल पूरे होने पर बधाई देने वाले सभी साथियों का सहृदय आभार।आयोजन को आगे बढ़ाते हुये आज हम पढ़ते हैं ओम प्रकाश नौटियाल जी के दोहे। ओम प्रकाश जी वड़ोदरा से हैं और हम से पहली बार जुड़ रहे हैं। आइये आप का स्वागत करें। अहमदाबाद, वड़ोदरा, राजकोट, सूरत, जूनागढ़ वग़ैरह वह शहर हैं जहाँ गरबा अपने मूलरूप में दृष्टिगोचर होता है। कैरियर के शुरुआती दिन मैं ने वड़ोदरा में गुजारे हैं इसलिये इस बात को कह पा रहा हूँ। ओम प्रकाश जी के दोहों में किंचित वह झलक देखने को मिली :-

आश्विन बीता, आ गया, शारदीय नवरात
अब ढोलक की थाप पर, थिरकेगा गुजरात

गरबा 
माँ तेरे परताप से, यों गरबे में दीप
चमत्कार से जिस तरह, चमका हो मुख-सीप
गरबा नृत्य
 दिलवालों की फ़ौज ने, ऐसा किया कमाल
जड़-चेतन सब हो गये, पल में मालामाल

कल शब भर नाचा किये, तनिक हुये बिन त्रस्त
मस्ती करने आज फिर, आ धमके अलमस्त
 
गरबा मस्ती
चणिया,चोली, केडिया, सुन्दर सब परिधान
गरबे के रँग में रँगा, सारा हिंदुस्तान

मिट्टी की एक गगरी / मटकी टाइप होती है जिसे गरबा कहा जाता है, फोटो भी दिया जा रहा है। पुराने ज़माने में [कई जगह आज भी] इस गरबे को सर पर रख कर नाचा जाता है तथा ऐसे नृत्य को ही गरबा-नृत्य कहा  जाता है। उस गरबे में रखे दीप की जो कल्पना ओम प्रकाश जी ने की है उस के लिये उन्हें अनेक साधुवाद। साथियो आनन्द लीजिये इन दोहों का और इन्हें नवाज़िए अपने कमेण्ट्स से। 


नमस्कार 

8 October 2013

दर-दर भटकसु रामजी, रावन बड़हन पेट - सौरभ पाण्डेय

नमस्कार

सन 2010 में अन्तर्जाल पर साहित्य-सेवार्थ जब आया था तो पता ही नहीं था कि दरअसल जाना किस तरफ़ है, किस के साथ संगत होगी, क्या और कैसे करना होगा....कुछ भी स्पष्ट नहीं था। ठीक वैसे ही जैसे आसमान से गिरती बूँद को अपना मुस्तक़्बिल पता नहीं होता। शनै: शनै: संयोग बनते गये, साथी मिलते गये और अब लग रहा है कि शायद गंतव्य की ओर जाता रास्ता मिल जाना चाहिये।

तीन साल पहले यानि 9 अक्तूबर को ठाले-बैठे पर पहली पोस्ट आयी थी, मत्तलब इस अन्तर्जालीय ब्लॉग यात्रा को आज तीन साल पूरे हो गये। जो कुछ भी थोड़ा कुछ हो पाया है, आप सभी के स्नेह और सहकार से ही हो पाया है, इस में ख़ाकसार का योगदान नगण्य जैसा ही है। तीन साल पूरा होने पर आप लोगों से सुझाव देने की प्रार्थना की गयी है। इसी पेज पर आप के लेफ्ट हेंड पर जो स्क्रॉल है वहाँ कुछ विकल्प दिये गये हैं, आप के बहुमूल्य समय में से थोड़ा सा वक़्त निकाल कर ठाले-बैठे की आगामी स्वरूप-संरचना में मददगार बनें। मुक्त हृदय से ठाले-बैठे से संबन्धित अपने विचार पटल पर रखने की कृपा करें, आप के विचार हमें आगे का रास्ता दिखाएंगे। 

कुछ आँकड़े :- 
  • यह 499 वीं पोस्ट है, यानि चौथे वर्ष में पदार्पण 500 वीं पोस्ट के साथ होगा। आने वाले समय में पोस्ट्स की घट-बढ़ के साथ यह संख्या परिवर्तित हो सकती है। 
  • पोस्ट लिखे जाने तक 5073 टिप्पणियाँ [इस में समस्या-पूर्ति तथा वातायन की ठाले-बैठे में मर्ज होने से पहले की टिप्पणियाँ शामिल नहीं]
  • वातायन में अब तक 92 रचनाधार्मियों की रचनाओं का प्रकाशन
  • समस्या-पूर्ति आयोजनों में अब तक 46 रचनाधार्मियों की रचनाओं का प्रकाशन
  • एक लाख से अधिक पोस्ट व्युस 
  • फ्लेग काउंटर के ज़रिये क़रीब 69 देशों के 102 फ्लेग्स 
  • अब तक 38 प्रकार के छंदों पर जानकारी एवं चर्चा 
  • अब तक 20 प्रकार की ग़ज़ल की बह्रों पर जानकारी   
आप के प्रयासों की उपलब्धियों पर पहला अधिकार आप का है, इस लिये उपरोक्त जानकारियाँ पटल पर रखना ज़ुरूरी लगा। 

छन्द-साहित्य को समर्पित ठाले-बैठे के तीन साल पूरे होने के उपलक्ष्य में आने वाली पोस्ट भी किसी छन्द से बेपनाह मुहब्बत करने वाले की हो, ऐसा मन में था। आदरणीय सलिल जी की पोस्ट आनी थी, परन्तु आचार्य जी एक विशेष पोस्ट पर मशक़्क़त कर रहे हैं इसलिये हम अपने अन्य सहधर्मी भाई श्री सौरभ पाण्डेय जी के दोहों से नवाज़ते हैं आज की पोस्ट को। संयोग वश दोहे भी भोजपुरी वाले हैं, अतएव मेरे भोजपुरी वाले सभी मित्रों का आभार-ज्ञापन स्वरूप भी है आज की पोस्ट। तो आइये पढ़ते हैं सौरभ जी के भोजपुरी दोहे :-  

जोन्ही भर के जोर पर, चिहुँकल छनकि अन्हार
ढिबरी भर के आस ले, मनवाँ सबुर सम्हार

रहि-रहि मन अकुतात बा, दुअरा लखन-लकीर
सीता सहमसु चूल्हि पर, बाया-बाया पीर

दर-दर भटकसु रामजी, रावन बड़हन पेट
चहुँप अजोध्या जानकी, भइली मटियामेट

तुलसी देई पूरि दऽ, भाखल अतने बात
बंस-बाँस के सोरि पर, कसहूँ नति हो घात

हमरो राजाराम के, लछमन भइले लाल
अँगना-दुअरा-खेत पर, सहमत लागो चाल

शब्दों का भावार्थ 
[जोन्ही - सितारे चिहुँकल - चौंकना छनकि - चट् से, छिनक कर अन्हार - अँधेरा सबुर - धीरज अकुताना - चंचल होना दुअरा - द्वार पर लखन-लकीर - लक्ष्मण-रेखा सहमसु - सहमती हैं चूल्हि - चूल्हा बाया-बाया - रोम-रोम पीर - दर्द, पीड़ा बड़हन - बहुत बड़ा चहुँप - पहुँच देई - देवी पूरि दऽ - पूरा कर दो भाखल -  भाखा हुआ, मनता माना हुआ अतने - इतना ही सोरि - जड़, मूल नति हो - मत हो घात - षड्यंत्र, आघात सहमत लागो चाल - मतैक्यता बनी रहे ]

शब्दों के भावार्थ से दोहों की भावदशा को समझ पाना सुगम हो सकेगा ऐसा विश्वास है. भोजपुरी भाषा की महत्ता किसी अंचल विशेष की भाषा होने के कारण नहीं है, बल्कि यह भाषा अपनी ठसक और अपने लालित्य दोनों के लिए जानी जाती है. कहना न होगा ऐसा अद्वितीय आचरण और अन्य भाषाओं में विरले मिलें. हाँ, दो भाषाएं अवश्य ही ऐसा आचरण निभाती दीखती हैं. उनमें से एक इसकी सहोदरा है, यानि, काशिका (बनारसी), तो दूसरी इसकी समभावी, यानि, अवधी. भोजपुरी भाषा का इतिहास जुझारुओं का इतिहास रहा है. जिजीविषा के परम भाव से आप्लावित जनों की भाषा ! और, इसके बाह्य और आंतरिक रूपों की प्रत्यक्ष भिन्नता और उनका प्रच्छन्न वैविध्य जानकारों तक को चकित करता है. प्रस्तुत दोहों के माध्यम से भोजपुरी भाषा के आंतरिक रूप के इसी लालित्यपूर्ण आचरण को समक्ष लाने का प्रयास हुआ है.  : [सौरभ पाण्डेय]

शर्ट-पेण्ट पहनना ग़लत नहीं है, कुर्सी टेबल पर बैठ कर खाने से भी कोई पहाड़ नहीं टूट पड़ता, रोज़मर्रा की बातचीत में अङ्ग्रेज़ी गिट-पिट कर लेने से भी कोई भूकम्प नहीं आ जाता......... परन्तु यदि हम अपनी माँ-बोलियों को भूल गये तो कलेज़े को ज़िन्दगी भर ठण्डक के लिये तरसना पड़ेगा। अपनी बोलियों को न भूलें मेरे भाई, यदा-कदा जब भी मौक़ा मिले उसे कलम-बद्ध करते रहें।

सौरभ भाई आप के दोहों की तारीफ़ में बस इतना ही कहूँगा कि इन्होंने पोस्ट की शान बढ़ा दी। जियो भाई, ख़ुश रहो और ख़ूब साहित्य-सेवा करो। साथियो सौरभ जी चमत्कृति के बनिस्बत संदेश पर अधिक ध्यान देते हैं, जो कि साहित्य का बहुत ही महत्वपूर्ण अङ्ग है। आज कल चारों तरफ़ हम देख पा रहे हैं कि चटपटे शब्दों और अभिनव प्रतीकों की लाली-लिपिस्टिक लगा के कविता-माई को बड़ी ही ख़ूबसूरत-नचनिया बना के पेश किया जा रहा है, और उस के पक्ष में ढ़ोल-नगाड़े बजाते हुये काफ़ी कुछ शोर-शराबा भी किया जा रहा है। ऐसे में शांति से अपना संदेश देने में सक्षम कविता का भरपूर मान होना चाहिये। सौरभ जी आप के इन दोहों के सम्मान में मैं अपना एक शेर पेश करना चाहूँगा 

हमने गर हुस्न और ख़ुशबू ही को तोला होता
फिर तो हर पेड़ गुलाबों से भी हल्का होता 

नमस्कार


विशेष निवेदन :- कृपया जिन लोगों ने दोहे भेजने हैं वे सभी प्लीज कल [बुधवार, 9 अक्तूबर] तक भेज दें, ताकि दशहरा तक उन दोहों को शामिल किया जा सके। यह आयोजन सिर्फ़ दशहरा तक ही चलना है। 
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