30 April 2013

मेरे बच्चो ! इस धरती पर प्यार की गंगा बहती थी - आलम ख़ुर्शीद

जीवन तो है खेल तमाशा , चालाकी, नादानी है
तब तक ज़िंदा रहते हैं हम जब तक इक हैरानी है

आग हवा और मिटटी पानी मिल कर कैसे रहते हैं
देख के खुद को हैराँ हूँ मैं , जैसे ख़्वाब कहानी है

इस मंज़र को आखिर क्यूँ मैं पहरों तकता रहता हूँ
ऊपर ठहरी चट्टानें हैं , तह में बहता पानी है

मेरे बच्चो ! इस धरती पर प्यार की गंगा बहती थी
देखो ! इस तस्वीर को देखो ! ये तस्वीर पुरानी है

आलम ! मुझको बीमारी है नींद में चलते रहने की
रातों में भी कब रुकता है मुझ में जो सैलानी है
:- आलम ख़ुर्शीद

28 April 2013

पाँच हाइकु - कैलाश शर्मा

दुर्गा की पूजा
कन्या की भ्रूण हत्या
दोगलापन.

रात का दर्द
समझा है किसने
देखी है ओस?

न जाने कब
फिसली थी उँगली
यादें ही बचीं

विकृत मन
देखे केवल देह
बालिका में भी.

नयन उठे,
बेरुखी थी आँखों में,
बरस गये
 
:- कैलाश शर्मा

27 April 2013

हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन - नवीन

अगर थाली में सिर्फ़ हलवा रख दिया जाये या सिर्फ़ नमकीन, तो आप को कैसा लगेगा? मैं समझता हूँ यही बात साहित्य [चाहे वह ग़ज़ल ही क्यूँ न हो] पर भी लागू होती है। कुछ लोगों को लगता है कि ग़ज़ल सिर्फ़ विशेष विषयों पर ही केन्द्रित रहनी चाहिये। चचा दुष्यंत के समझाने पर भी नहीं समझे हैं ऐसे महानुभाव.... क्या करें? भाई जहाँ तक तकनीक का प्रश्न है वह तो ठीक, पर विषय तो हर शायर के अपनी पसंद के होते हैं। लिहाज़ा तथाकथित बुद्धिजीवी वर्ग को उन के हाल पर छोड़ते हुये मैं तो अपने मूड की ही शायरी करता हूँ। मैं अपनी ग़ज़लों को सिर्फ़ एक ही टोन की बजाय विविध रंग देना चाहता हूँ और इस राह पर चलना ही मुझे अच्छा भी लगता है। मेरे कुछ छोटे-बड़े भाई मेरी इस इच्छा को मेरी ख़ुराफ़ात भी कहते हैं तो उन के विचारों का बुरा न मानते हुये आप को एक ग़ज़ल पढ़वाता हूँ :- 

न जाने कैसी सियाही से लिखते थे क़ातिब
ग़ज़ल के पन्ने अभी तक दमकते हैं साहिब

हवस की आग ने पानी से जगमगा दी ज़मीन
ग़लत नहीं है ज़रा भी ये तर्क है वाज़िब ***

मैं बे-गुनाह जमानत नहीं जुटा पाया
गुनाहगार नहीं हूँ, शरीफ़ हूँ साहिब

मैं अपनी चाह की जानिब कभी न चल पाया
रवाँ है मौत की जानिब हयात का तालिब

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है ++++
मैं शेर कह के ‘तख़ल्लुस’ में टाँक दूँ ‘ग़ालिब’


1.क़ातिब - पैसे ले कर किसी के लिये चिट्ठी-पत्री, अर्ज़ियाँ या कुछ और भी लिखने वाला 
2.**** आदमी की हवस की आग बढ़ी, उसे कृत्रिम उजाले की ज़रूरत पड़ी, उसने पानी से बिजली बनाई जिस से आज तमाम दुनिया जगमगा रही है। ख़याल नया है इस लिये स्पष्टीकरण देना पड़ा है। प्रतीक कोई भी हो, जब भी पहली बार नज़्म हुआ होगा, बंदे को खुलासा करना पड़ा ही होगा।
3. चाह की जानिब - इच्छा की तरफ़ / ओर / दिशा में
4. रवाँ है - चल रहा है 
5. मौत की जानिब - मृत्यु की तरफ़
6. हयात का तालिब -ज़िन्दगी को ढूँढने वाला  
7. ++++ कुछ दिन पहले मैंने अपने एक शायर! दोस्त को अपना शेर [काश मैं भी किसी रहमत का ज़रीया होता] सुनाया और पूछा यार ये किस का शेर है? जनाब ने बड़ी ही शिद्दत के साथ फ़रमाया शायद फ़िराक़ या ग़ालिब का है। और जैसे ही मैंने उन से कहा कि मेरा है तो हजरत बोले "ठीक-ठाक है"। तभी साहिर लुधियानवी साहब का एक मिसरा "कभी-कभी मेरे दिल में ख़याल आता है" ज़हन में आया और यह शेर हो गया।


बहरे मुजतस मुसमन मखबून
मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फ़ालुन

1212 11222 1212 22

नवीन सी. चतुर्वेदी 

21 April 2013

चन्द अशआर - मयंक अवस्थी

तारों से और बात में कमतर नहीं हूँ मैं
जुगनू हूँ इस लिये कि फ़लक पर नहीं हूँ मैं

मियाँ मजबूरियों का रब्त अक्सर टूट जाता है
वफ़ाएँ गर न हों बुनियाद में, घर – टूट जाता है

इस तरह हमने समन्दर को पिलाया पानी

19 April 2013

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी - तुलसीदास

राम जन्म

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी . 
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी .. 
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी . 
भूषन वनमाला नयन बिसाला सोभासिन्धु खरारी .. 

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी किहिं बिधि करौं अनंता .

आँसू टपका और फिर यूँ उस के पैकर पर बैठ गया - नवीन


आँसू टपका और फिर यूँ उस के पैकर पर बैठ गया
जैसे इक पानी का क़तरा अस्ल गुहर पर बैठ गया
पैकर - देह / आकृति, गुहर - मोती
 
भोर हुई, चिड़ियाँ चहकीं, कलियों पर भँवरे बैठ गये
दीवाना दिल क्या करता, यादों के खँडर पर बैठ गया

उम्मीदों को मायूसी में ढलते देख रहा हूँ रोज़
हाय! दिलेनादाँ!! किस पत्थरदिल के दर पर बैठ गया

झूठ की बीन बजाएँ कब तक सच आख़िर सच होता है
जिसे भी थोड़ी इज़्ज़त दे दी वो ही सर पर बैठ गया
 
बहुत नचाता था सब को फिर उस का हश्र हुआ कुछ यूँ
चढ़ी नदी में बहता एक दरख़्त भँवर पर बैठ गया
दरख़्त - बड़ा पेड़
 
जब देखो तब सिर्फ़ अँधेरों की ही बातें करते हैं 
जाने किस मनहूस का साया अहलेनज़र पर बैठ गया

हम जैसे नादाँ अब तक नक्शे में ढूँढ रहे हैं राह   
उस को उड़ कर जाना था वो उड़ती ख़बर पर बैठ गया

ग़ज़ल रवानी की मुहताज़ नहीं, पर क्या कीजै हज़रत
ग़ज़ल का हरकारा ही जब अंतिम अक्षर पर बैठ गया

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

17 April 2013

अज़्म ले कर जब सफ़ीने छूटते हैं - नवीन


अज़्म ले कर जब सफ़ीने छूटते हैं।
जलजलों के भी पसीने छूटते हैं॥
 अज़्म - संकल्प सफ़ीना - नाव,  जलजला - विकट तूफान

छुट नहीं पायेंगे यादों से मरासिम।
औरतों से कब नगीने छूटते हैं॥
 मरासिम - सम्बंध

झूठ-मक्कारी-दग़ा-रिश्वत-ख़ुशामद।
कितने लोगों से ये ज़ीने छूटते हैं॥
 ज़ीना - ऊपर जाने की सीढ़ियाँ

टूट ही जाती है बेऔलाद औरत।
ज्यों ही बछड़े दूध पीने छूटते हैं॥

चाँद जब खिड़की से बाहर झाँकता है।
बेढ़बों से भी क़रीने छूटते हैं॥
 क़रीना - यहाँ style मारने के अर्थ में प्रयुक्त हुआ है



:- नवीन सी. चतुर्वेदी

जिस के दिल में प्यार है, सीना उसी का चाक है - नवीन


जिसके दिल में प्यार है, सीना उसी का चाक है।
वरना तो माहौल काफ़ी ख़ुशगवार-ओ-पाक है॥


हमने अपने पाँव से काँटा निकाला है फ़क़त।
राह रुसवा हो गई, ये बात हैरतनाक है॥


सौ थपेड़े झेल कर भी बढ़ रहा है दम-ब-दम।
आदमी बहरे-फ़ना का अव्वली तैराक है॥


शौक़ से फिर छेड़ देना जंग लेकिन एक बार।
देख तो लें घर में कितने रोज़ की ख़ूराक है॥


क़ायदा बनने से पहले तोड़ना तय हो गया।
सारा सब तो दिख रहा है कैसी ये पोशाक है॥

क्या बतायें आप को मिलता है क्या बैराग में - नवीन


क्या बतायें आप को मिलता है क्या बैराग में
ख़ुशबुओं के सिलसिले बहते हैं ठण्डी आग में



बीस घण्टे जागती इस नस्ल को समझाये कौन
ज़िन्दगी बरबाद हो जाती है भागमभाग में



ये गुलो-बुलबुल तमाशे आप के सदके हुज़ूर
हम फ़क़ीरों को भला मिलना है क्या खटराग में



हाय अपने शह्र में भूखे पड़े हैं अज़नबी
आइये कुछ रत्न जड़ लें ज़िन्दगी की पाग में



और सब लमहे तो आयेंगे गुजर जायेंगे बस
चन्द घड़ियाँ ही पगेंगी वक़्त के अनुराग में



गर न मानो प्यार के पानी को छू कर देख लो
दिल की मिट्टी घुल नहीं पाती हवस के झाग में



झूठ-मक़्क़ारी की रबड़ी आप ही खायें 'नवीन'
हमको तो दिखते हैं छप्पन भोग रोटी-साग में 




:- नवीन सी. चतुर्वेदी

14 April 2013

मैं दिल की स्लेट पे जो ग़म तमाम लिख देता - नवीन

मैं दिल की स्लेट पे जो ग़म तमाम लिख देता
कोई न कोई वहीं इन्तक़ाम लिख देता
इंतक़ाम - प्रतिशोध / बदला
 
ख़मोशियों को इशारों से भी रहा परहेज़
वगरना कैसे कोई शब को शाम लिख देता
शब - रात

मेरे मकान की सूरत बिगाड़ने वाले
तू इस मकान पे अपना ही नाम लिख देता

वहाँ पहुँच के भी उस की तलाश थी कुछ और
फ़क़ीर कैसे खँडर को मक़ाम लिख देता
मक़ाम - मंज़िल 

मेरे भी आगे कई पगड़ियाँ फिसल पड़तीं
जो अपने नाम के आगे इमाम लिख देता
इमाम - पंडित / मौलवी / पादरी वग़ैरह 

बहार आती है मुझ तक, मगर बुलाने पर
तो फिर मैं कैसे उसे फ़ैज़-ए-आम लिख देता  
 फ़ैज़-ए-आम - वह प्रगति / सुविधा / सुख जो जन-साधारण को सहज उपलब्ध हो 

:- नवीन सी. चतुर्वेदी

मुफ़ाएलुन फ़एलातुन मुफ़ाएलुन फालुन  
1212 1122 1212 22 

बहरे मुजतस मुसमन मखबून

नई पुरानी पोस्ट्स ढूँढें यहाँ पर

काव्य गुरु
प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी

काव्य गुरु <br>प्रात: स्मरणीय परमादरणीय कविरत्न स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी
जन्म ११ मई १९३१
हरि शरण गमन १४ मार्च २००५

My Bread and Butter

यहाँ प्रकाशित सभी सामग्री के सभी अधिकार / दायित्व तत्सम्बन्धित लेखकाधीन हैं| अव्यावसायिक प्रयोग के लिए स-सन्दर्भ लेखक के नाम का उल्लेख अवश्य करें| व्यावसायिक प्रयोग के लिए पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है|

साहित्यम पर अधिकान्शत: छवियाँ साभार गूगल से ली जाती हैं। अच्छा-साहित्य अधिकतम व्यक्तियों तक पहुँचाने के प्रयास के अन्तर्गत विविध सामग्रियाँ पुस्तकों, अनतर्जाल या अन्य व्यक्तियों / माध्यमों से सङ्ग्रहित की जाती हैं। यहाँ प्रकाशित किसी भी सामग्री पर यदि किसी को किसी भी तरह की आपत्ति हो तो अपनी मंशा विधिवत सम्पादक तक पहुँचाने की कृपा करें। हमारा ध्येय या मन्तव्य किसी को नुकसान पहुँचाना नहीं है।