23 June 2012

बादशाहों का फ़क़ीरों से बड़ा रुतबा न था - कृष्ण बिहारी 'नूर'


कृष्ण बिहारी 'नूर'


बादशाहों का फ़क़ीरों से बड़ा रुतबा न था
उस समय धर्म और सियासत में कोई रिश्ता न था

शख़्स मामूली वो लगता था मगर ऐसा न था
सारी दुनिया जेब में थी हाथ में पैसा न था

प्यार मिलता है प्यार देने से - तर्ज़ लखनवी


तर्ज़ लखनवी


जाने जाने की बात करते हो
क्यूँ सताने की बात करते हो

प्यार मिलता है प्यार देने से
किस ज़माने की बात करते हो

ग्राम सुधार - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

सुघरे मकान होंय, चहुंधा उद्यान होंय,
सब ही समान होंय, ध्यान होंय काम में।

 छोटे परिवार होंय, ब्रिच्छ हू हज़ार होंय,
होंय व्हाँ बजार, मिलें - वस्तु सत्य दाम में।

कूप होंय, ताल होंय, सुंदर चौपाल होंय,
बाल हू खुसाल होंय, खेलें केलि धाम में।

'प्रीतम' अपार अन्न-धन के भण्डार होंय,
होंय यों सुधार यथा सीघ्र गाम-गाम में।।
:- यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'
['राष्ट्र हित शतक' से साभार]

इस क़दर बदलेगी दुनिया हमको अंदाज़ा न था - सैयद रियाज़ रहीम


सैयद रियाज़ रहीम



सोचता कोई नहीं है हाँ ही हाँ कहते हैं सब
चाहे कैसी भी ज़मीं हो आसमाँ कहते हैं सब

इस क़दर बदलेगी दुनिया हमको अंदाज़ा न था
जो हक़ीक़त है उसे भी दासताँ कहते हैं सब

खिल उठा है बहार का मौसम - राज़दान 'राज़'


राज़दान 'राज़'


आँखों में कोई तो नदी होगी
बर्फ़ दिल में पिघल रही होगी

ऊँचे पेड़ों पे आशियाना था
पहले बिजली वहीं गिरी होगी

लघु उद्योगन तें गरीबन सँभार होत - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

लघु उद्योगन तें गरीबन सँभार होत
प्यार होत समृद्धि औ संपति के पाये ते

छोटे परिवारमें दुलार होत संतति कौ
सार औ सँभार होत दो ही सुत* जाये ते

सिच्छा के प्रचार ही ते पावन विचार होत
कोऊ ना लाचार होत बुद्धि बिकसाये ते

'प्रीतम' अपार अन्न-धन कौ भण्डार होत
सुख कौ अधार होत खेत हरियाये ते

*यहाँ 'दो सुत' का अभिप्राय 'दो बच्चों' से है 

:- यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'
['राष्ट्र हित शतक' से साभार]

20 June 2012

पहले तो इज़हार टाला जायेगा - नवीन

पहले तो इज़हार  टाला जायेगा 
फिर बहानों को खँगाला जायेगा।१।

चैन लूटा, दिल भी घायल कर दिया।
और क्या अब दम निकाला जायेगा।२।

रो रहे हो क्यों, तुम्हें बोला तो था।
आँख से काजल निकाला जायेगा।३।

हम भला इन मुश्किलों से क्यों डरें।
जैसे भी होगा सँभाला जायेगा।४। 

मूँद कर आँखें करो रब दा ख़याल।
नाभि तक उस का उजाला जायेगा।५।

काश अगली बार कुछ इंसाफ़ हो।
अब के बस मुद्दा उछाला जायेगा।६।

कर्ज़ के बिन कुछ भी हो पाता नहीं ।
क्या वतन ऐसे सँभाला जायेगा।७।

तुमसे गर सँभले नहीं तो छोड़ दो ।
जैसे भी होगा सँभाला जायेगा  ।८।

बहरे रमल मुसद्दस महजूफ
फ़ाएलातुन  फ़ाएलातुन  फ़ाएलुन  

२१२२ २१२२ २१२

15 June 2012

चंद अश'आर - अनवारे इसलाम


अनवारे इस्लाम


मैं धरती पर मुहब्बत चाहता हूँ
हवाओं पे मेरा पैगाम लिख दे 
*
कैसे बच्चों को खेलते देखूँ
दिन तो रस्ते में डूब जाता है
*
वो अपनी माँ को समझाने लगी है
मेरी बिटिया सयानी हो रही है
*
पत्थरों का नगर काँच का "जिस्म" है
ले के "माँ की अमानत" मैं जाऊँ कहाँ
*
 मेरा वजूद बाप की शफ़क़त [प्यार] से ढँक गया
जब भी किसी बुजुर्ग ने बेटा कहा मुझे
*
चारों तरफ़ बबूल हैं सरसों के खेत में
किसकी ये साजिशें हैं कोई सोचता नहीं
*
नई दुनिया बसाई जा रही है
तबाही भी मचाई जा रही है
*
झुकाया जा रहा है आस्माँ को
ज़मीं सर पर उठाई जा रही है
*
किसी के हाथ मिट्टी से सने हैं
कोई ख़ुशबू से ख़ुशबू धो रहा है 
*
देख कर तुमको याद आता है 
हमने क्या खो दिया जवानी में 
*
बारिशों में हो साथ कोई तो
लुत्फ़ आता है भीग जाने में
*
ख़ुदा मुझको वहाँ जन्नत ही देगा
जहन्नुम तो यहीं पर दे दिया है 
*
हमने तमाम उम्र अँधेरों में काट दी
लेकिन किसी चिराग़ से सौदा नहीं किया
*
सूखा पड़ा तो सूख गई फ़स्ल धान की
सूरज की धूप पी गयी मेहनत किसान की
*
वो इस तरह से भी तारीकियाँ बढ़ा देगा
चिराग़ जितने हैं रौशन उन्हें बुझा देगा 
*
 हवा के साथ चिराग़ों ने दोसती कर ली
अज़ीब लोग हैं घबरा के ख़ुदकुशी कर ली
*
हम दिमाग़ों में बस गये होते
दिल की बातों में गर नहीं आते
*
है ख़तरा बस्तियों के डूबने का
समन्दर पैर फैलाने लगा है
*
तुमको मिला जो हुस्न, मुझे शाइरी मिली
दौनों पे रहमतें मिरे परवरदिगार की
 *
ख़्वाबों में मेरे आज तक उतरी नहीं परी
दादी ने जो सुनाये वो क़िस्से फ़जूल थे
*

 'मिजाज़ कैसा है' से उद्धृत

अनवारे इस्लाम
सम्पादक - सुखनवर पत्रिका
C-16, सम्राट कौलोनी,
अशोका गार्डन,
भोपाल - 462023
मोबाइल - +91 98 93 66  3536
ईमेल - sukhanwar12@gmail.com

13 June 2012

एकता अधार राष्ट्र-भाषा एक भारती - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'



फल की सफलता में मूल ही अधार होत
मूल कौ अधार बीज, बीज धरा धारती

धरा उरबरा हेतु नीर है अधार सार
नीर की अधार, नभ - घटा वारि ढारती

'प्रीतम' विवेक, ता की - बुद्धि त्यों अधार रही
बुद्धि की अधार सिच्छा - नेकता उभारती

नेकता अधार प्यार, एकता की माल गुहै
एकता अधार राष्ट्र - भाषा एक भारती 


:- यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

4 June 2012

श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की - यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

राधा रानी और तुलसी पूजा







श्री राधा आराध्य सुगम गति आराधन की।
जो अति अगम अपार न है मति जहँ निगमन की।
ज्ञान मान की खान ध्यान धारा भगतन की।
प्रिय 'प्रीतम' की प्रान प्रमान पतित पावन की।।


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